तदीयमातङ्गघटाविघट्टितैः
कटस्थलप्रोषितदानवारिभिः ।
गृहीतदिक्कैरपुनर्निवर्तिभि-
श्चिराय याथार्थ्यमलम्बि दिग्गजैः ॥
तदीयमातङ्गघटाविघट्टितैः
कटस्थलप्रोषितदानवारिभिः ।
गृहीतदिक्कैरपुनर्निवर्तिभि-
श्चिराय याथार्थ्यमलम्बि दिग्गजैः ॥
कटस्थलप्रोषितदानवारिभिः ।
गृहीतदिक्कैरपुनर्निवर्तिभि-
श्चिराय याथार्थ्यमलम्बि दिग्गजैः ॥
मल्लिनाथः
तदीयेति ॥ तदीयमातङ्गानां घटाभिर्व्यूंहैः विघट्टितैरभिहतैः । `करिणां घटना घटा` इत्यमरः । अत एव कटस्थलेभ्यः प्रोषितान्यपगतानि दानवारीणि येषां तैः। गृहीताः पलाय्य संश्रिता दिशो यैस्तैर्गृहीतदिक्कैः। शेषाद्विभाषा` (अष्टाध्यायी ५.४.१५४ ) इति कप् । अपुनर्निवर्तिभिर्भयात्तत्रैव स्थितैर्दिग्गजैः चिराय याथार्थ्यं दिक्षु स्थिता गजा दिग्गजा इत्यनुगतार्थनामकत्वमलम्भि लब्धम् । लभेर्ण्यन्तात् कर्मणि लुङ् । `विभाषा चिण्णमुलोः` (अष्टाध्यायी ७.१.६९ ) इति विकल्पान्नुमागमः
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | दी | य | मा | त | ङ्ग | घ | टा | वि | घ | ट्टि | तैः |
| क | ट | स्थ | ल | प्रो | षि | त | दा | न | वा | रि | भिः |
| गृ | ही | त | दि | क्कै | र | पु | न | र्नि | व | र्ति | भि |
| श्चि | रा | य | या | था | र्थ्य | म | ल | म्बि | दि | ग्ग | जैः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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