पिशङ्गमौञ्जीयुजमर्जुनच्छविं
वसानमेणाजिनमञ्नद्युति ।
सुवर्मसूत्राकलिताधराम्बरां
विडम्बयन्तं शितिवाससस्तनुम् ॥
पिशङ्गमौञ्जीयुजमर्जुनच्छविं
वसानमेणाजिनमञ्नद्युति ।
सुवर्मसूत्राकलिताधराम्बरां
विडम्बयन्तं शितिवाससस्तनुम् ॥
वसानमेणाजिनमञ्नद्युति ।
सुवर्मसूत्राकलिताधराम्बरां
विडम्बयन्तं शितिवाससस्तनुम् ॥
मल्लिनाथः
पिशङ्गेति ॥ पुनः कीदृशम् । मुञ्जस्तृणविशेषः तन्मयी मेखला मौञ्जी पिशङ्ग्या मौङ्ज्या युज्यत इति पिशङ्गमौञ्जीयुक् तम् । `सत्सूद्विष-` (अष्टाध्यायी ३.२.६१ ) इत्यादिना क्विप् । `स्त्रियाः पुंवत्-` (अष्टाध्यायी ६.३.३४ ) इति पिशङ्गशब्दस्य पुंवद्भावः। अर्जुनच्छविं धवलकान्तिम् । `वलक्षो धवलोऽर्जुनः` इत्यमरः । अञ्जनद्युत्यञ्जनवर्ण एणाजिनं कृष्णमृगचर्म वसानमाच्छादयन्तम् । `वस आच्छादने` इति धातोः शानच् । सुवर्णसूत्रेण कनकमेखलया आकलितं बद्धमधराम्बरमन्तरीयकं यस्यास्तां शितिवाससो नीलाम्बरस्य रामस्य तनुं विडम्बयन्तम् । अनुकुर्वाणमित्यर्थः । आर्थीयमुपमा
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पि | श | ङ्ग | मौ | ञ्जी | यु | ज | म | र्जु | न | च्छ | विं |
| व | सा | न | मे | णा | जि | न | म | ञ्न | द्यु | ति | |
| सु | व | र्म | सू | त्रा | क | लि | ता | ध | रा | म्ब | रां |
| वि | ड | म्ब | य | न्तं | शि | ति | वा | स | स | स्त | नुम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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