दधानमम्भोरुहकेसरद्युती-
र्जटाः शरच्चन्द्र मरीचिरोचिषम् ।
विपाकस्तुङ्गास्तुहिनस्थलीरुहो
धरादरेन्द्रं व्रततीततीरिव ॥
दधानमम्भोरुहकेसरद्युती-
र्जटाः शरच्चन्द्र मरीचिरोचिषम् ।
विपाकस्तुङ्गास्तुहिनस्थलीरुहो
धरादरेन्द्रं व्रततीततीरिव ॥
र्जटाः शरच्चन्द्र मरीचिरोचिषम् ।
विपाकस्तुङ्गास्तुहिनस्थलीरुहो
धरादरेन्द्रं व्रततीततीरिव ॥
मल्लिनाथः
दधानमिति ॥ पुनः कीदृशम् । अम्भोरुहकेसरद्युतीः पद्मकिंजल्कप्रभापिशङ्गीरित्यर्थः । जटा दधानम् , स्वयं तु शरच्चन्द्रमरीचिरिव रोचिर्यस्य तम् । धवलमित्यर्थः । अत एव विपाकेन परिणामेन पिङ्गाः पिङ्गलास्तुहिनस्थल्यां तुषारभूमौ रोहन्तीति तुहिनस्थलीरुहः व्रततीततीर्लताव्यूहान् `वल्ली तु व्रततिर्लता` इत्यमरः । दधानं धराधरेन्द्रो हिमवान् तुहिनस्थलीति लिङ्गान्नारदोपमानत्वाच्च तमिव स्थितम्
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| द | धा | न | म | म्भो | रु | ह | के | स | र | द्यु | ती |
| र्ज | टाः | श | र | च्च | न्द्र | म | री | चि | रो | चि | षम् |
| वि | पा | क | स्तु | ङ्गा | स्तु | हि | न | स्थ | ली | रु | हो |
| ध | रा | द | रे | न्द्रं | व्र | त | ती | त | ती | रि | व |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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