रणेषु तस्य प्रहिताः प्रचेतसा
सरोषहुङ्कारपराङ्मुखीकृताः ।
प्रहर्तुरेवोरगराजरज्जवो
जवेन कण्ठं सभयाः प्रपेदिरे ॥
रणेषु तस्य प्रहिताः प्रचेतसा
सरोषहुङ्कारपराङ्मुखीकृताः ।
प्रहर्तुरेवोरगराजरज्जवो
जवेन कण्ठं सभयाः प्रपेदिरे ॥
सरोषहुङ्कारपराङ्मुखीकृताः ।
प्रहर्तुरेवोरगराजरज्जवो
जवेन कण्ठं सभयाः प्रपेदिरे ॥
मल्लिनाथः
रणेष्विति ॥ किंच रणेषु प्रचेतसा वरुणेन प्रहिताः प्रयुक्ता उरगराजा महासर्पास्ते रज्जव इव उरगराजरज्जवः । नागपाशा इत्यर्थः । तस्य रावणस्य सरोषहुंकारेण पराङ्मुखीकृता व्यावर्तिताः । अत एव सभयाः सत्यः जवेन वेगेन प्रहर्तुः प्रयोक्तुः प्रचेतस एव कण्ठं प्रपेदिरे प्राप्ताः । अत्र परहिंसाप्रयुक्तस्यायुधस्य वैपरीत्येन स्वकण्ठग्रहणादनर्थोत्पत्तिरूपो विषमालंकारः । `विरुद्धकार्यस्योत्पत्तिर्यत्रानर्थस्य वा भवेत्` इति लक्षणात्
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| र | णे | षु | त | स्य | प्र | हि | ताः | प्र | चे | त | सा |
| स | रो | ष | हु | ङ्का | र | प | रा | ङ्मु | खी | कृ | ताः |
| प्र | ह | र्तु | रे | वो | र | ग | रा | ज | र | ज्ज | वो |
| ज | वे | न | क | ण्ठं | स | भ | याः | प्र | पे | दि | रे |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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