नवानधोऽधो बृहतः पयोधरा-
न्समूढकर्पूरपरागपाण्डुरम् ।
क्षणं क्षणोत्क्षिप्तगजेन्द्रकृत्तिना
स्फुटोपमं भूतिसितेन शम्घुना ॥
नवानधोऽधो बृहतः पयोधरा-
न्समूढकर्पूरपरागपाण्डुरम् ।
क्षणं क्षणोत्क्षिप्तगजेन्द्रकृत्तिना
स्फुटोपमं भूतिसितेन शम्घुना ॥
न्समूढकर्पूरपरागपाण्डुरम् ।
क्षणं क्षणोत्क्षिप्तगजेन्द्रकृत्तिना
स्फुटोपमं भूतिसितेन शम्घुना ॥
मल्लिनाथः
नवानित्यादिभिः ॥ कीदृशममुम् । नवान्सद्यः संभृतसलिलान् । अतिनीलानिति यावत् । बृहतो विपुलान्पयोधरान्मेघानधोऽधः । मेघानां समीपाधःप्रदेशे स्थितमिति शेषः । `उपर्यध्यधसः सामीप्ये` (पा.८।१।७ ) इति द्विर्भावः । तद्योगे द्वितीया । `उभसर्वतसोः कार्या धिगुपर्यादिषु त्रिषु` ईत्यादिवचनात् । समूढः पुञ्जीकृतः । `समूढः पुञ्जिते भुग्ने` इति विश्वः । कर्पूरस्य परागचूर्णं तद्वत्पाण्डुरम् । अत एव क्षणं मेघसमीपावस्थानक्षणे । अत्यन्तसंयोगे द्वितीया ।क्षणेषु ताण्डवोत्सवेषु । `निर्व्यापारस्थितौ कालविशेषोत्सवयोः क्षणः` इत्युभयत्राप्यमरः । उत्क्षिप्ता उपरि धारिता गजेन्द्रस्य कृत्तिश्चर्म येन तेन । `अजिनं चर्म कृत्तिः स्त्री` इत्यमरः । भूत्या भस्मना सितेन । `भूतिर्भस्मनि संपदि` इत्यमरः। शंभुना हरेण स्फुटा उपमा सादृश्यं यस्य तं स्फुटोपमम् । स्फुटशंभूपममित्यर्थः । सापेक्षत्वेऽपि गमकत्वात्समासः । सदृशपर्याययोस्तुलोपमाशब्दयोः `अतुलोपमाभ्याम्-` इति निषेधात्सादृश्यवाचित्वे तृतीयेत्याहुः । केचिदिमं श्लोकं चयस्त्विषामित्यतः प्राग्लिखित्वा व्याचक्षते । तेषां पुंस्त्वावधारणात्प्राक् तेजःपिण्डमात्रस्य शंभूपमौचित्यं चिन्त्यम्
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| न | वा | न | धो | ऽधो | बृ | ह | तः | प | यो | ध | रा |
| न्स | मू | ढ | क | र्पू | र | प | रा | ग | पा | ण्डु | रम् |
| क्ष | णं | क्ष | णो | त्क्षि | प्त | ग | जे | न्द्र | कृ | त्ति | ना |
| स्फु | टो | प | मं | भू | ति | सि | ते | न | श | म्घु | ना |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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