विनोदमिच्छन्नथ दर्पजन्मनो
रणेन कण्ड्वास्त्रिदशै समं पुनः ।
स रावणो नाम निकामभीषणं
बभूव रक्षः क्षतरक्षणं दिवः ॥
विनोदमिच्छन्नथ दर्पजन्मनो
रणेन कण्ड्वास्त्रिदशै समं पुनः ।
स रावणो नाम निकामभीषणं
बभूव रक्षः क्षतरक्षणं दिवः ॥
रणेन कण्ड्वास्त्रिदशै समं पुनः ।
स रावणो नाम निकामभीषणं
बभूव रक्षः क्षतरक्षणं दिवः ॥
मल्लिनाथः
विनोद मिति ॥ अथ स हिरण्यकशिपुः पुनर्भूयोऽपि त्रिदशैः समं सह । `साकं साधं समं सह` इत्यमरः । रणेन दर्पादन्तःसाराज्जन्म यस्यास्तस्याः कण्ड्वाः भुजकण्डूतेर्विनोदमपनोदमिच्छन् । प्राग्भवनखक्षतैस्तदपनोदाभावादित्यर्थः । दिवः स्वर्गस्य क्षतं नष्टं रक्षणं रक्षा येन तत् । क्षतधुरक्षणमित्यर्थः । सापेक्षत्वेऽपि गमकत्वात्समासः। अनेन देवसर्वस्वापहारित्वमुक्तम् । भीषयत इति भीषणः । नन्द्यादित्वात् ल्युः । `भियो हेतुभये षुक्` (अष्टाध्यायी ७.३.४० ) इति षुक् । निकामं भीषणः । `सुप्सुपा` इति समासः । रावणो नाम रावण इति प्रसिद्धं रक्षो बभूव । राक्षसयोनौ जात इत्यर्थः। विश्रवसोऽपत्यं पुमान् रावण इति विग्रहः। `तस्यापत्यम्` (अष्टाध्यायी ४.१.९२ ) इत्यणि कृते `विश्रवसो विश्रवणरवणौ` इति प्रकृते रवणादेशः । पौराणिकास्तु रावयतीति व्युत्पादयन्ति । तदुक्तमुत्तरकाण्डे-`यस्माल्लोकत्रयं चैतद्रावितं भयमागतम् । तस्मात्त्वं रावणो नाम नाम्ना वीरो भविष्यसि ॥` (१६।३८) इति । रौतेर्ण्यन्तात्कर्तरि ल्युट् । रावणरक्षसोर्नियतलिङ्गत्वाद्विशेषणविशेष्यभावेऽपि स्वलिङ्गता
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | नो | द | मि | च्छ | न्न | थ | द | र्प | ज | न्म | नो |
| र | णे | न | क | ण्ड्वा | स्त्रि | द | शै | स | मं | पु | नः |
| स | रा | व | णो | ना | म | नि | का | म | भी | ष | णं |
| ब | भू | व | र | क्षः | क्ष | त | र | क्ष | णं | दि | वः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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