सटाच्छटभिन्नघनेन बिभ्रता
नृसिंह सैंहीमतनुं तनुं त्वया ।
स मुग्धकान्तास्तनसङ्गभङ्गुरै-
रुरोविदारं प्रतिचस्किरे नखैः ॥
सटाच्छटभिन्नघनेन बिभ्रता
नृसिंह सैंहीमतनुं तनुं त्वया ।
स मुग्धकान्तास्तनसङ्गभङ्गुरै-
रुरोविदारं प्रतिचस्किरे नखैः ॥
नृसिंह सैंहीमतनुं तनुं त्वया ।
स मुग्धकान्तास्तनसङ्गभङ्गुरै-
रुरोविदारं प्रतिचस्किरे नखैः ॥
मल्लिनाथः
सटाच्छटेति ॥ हे नृसिंह, नरः सिंह इवेत्युपमितसमासः । ना चासौ सिंह`श्चेति प्रस्तावात् । सिंहस्येमां सैंहीं तनुं कायं बिभ्रता । नृसिंहावतारभाजेत्यर्थः । किंभूताम् । अतनुं विस्तीर्णाम् । अत एव सटाच्छटाभिः केशरसमूहैः भिन्ना घना मेघा पाठा०-१ `गुणानि`. २ `श्रियाम्`. ३ `यद्वा` इत्यत आरभ्य `समासान्तः` इत्यन्तः पाठः क्वचिन्न पठ्यते. येन । अभ्रंकषविग्रहत्वादिति भावः । `सटा जटाकेशरयोः` इति `तनुः काये कृशेऽल्पे च` इति विश्वः । त्वया स दैत्यः । मुग्धौ नवौ । `मुग्धः सौम्ये नवे मूढे` इति वैजयन्ती । यो कान्तास्तनौ तयोः सङ्गेनापि भङ्गुरैः कुटिलैर्नखैरुरोविदारम् उरो विदार्य । `परिक्लिश्यमाने च` (अष्टाध्यायी ३.४.५५ ) इति णमुल्प्रत्ययः । प्रतिचस्करे हतः । किरतेः कर्मणि लिट् । `ऋच्छत्यृृताम्` (अष्टाध्यायी ७.४.११ ) इति गुणः । “हिंसायां प्रतेश्च` (अष्टाध्यायी ६.१.१४१ ) इति सुडागमः । वज्रकठिनोऽपि नखैर्विदारित इति वाङ्मनसयोरगोचरमहिम्नस्ते किमसाध्यमिति भावः
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | टा | च्छ | ट | भि | न्न | घ | ने | न | बि | भ्र | ता |
| नृ | सिं | ह | सैं | ही | म | त | नुं | त | नुं | त्व | या |
| स | मु | ग्ध | का | न्ता | स्त | न | स | ङ्ग | भ | ङ्गु | रै |
| रु | रो | वि | दा | रं | प्र | ति | च | स्कि | रे | न | खैः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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