समत्सरेणासुर इत्युपेयुषा
चिराय नाम्नः प्रथमाभिधेयतां ।
भयस्यपूर्वावतरस्तरस्विना
मनस्तु येन द्युसदां न्यधीयत ॥
समत्सरेणासुर इत्युपेयुषा
चिराय नाम्नः प्रथमाभिधेयतां ।
भयस्यपूर्वावतरस्तरस्विना
मनस्तु येन द्युसदां न्यधीयत ॥
चिराय नाम्नः प्रथमाभिधेयतां ।
भयस्यपूर्वावतरस्तरस्विना
मनस्तु येन द्युसदां न्यधीयत ॥
मल्लिनाथः
समत्सरेणेति ॥ समत्सरेण अन्यशुभद्वेषसहितेन । `मत्सरोऽन्यशुभद्वेषे` इत्यमरः । अस्यतीत्यसुरः । असेरुरन् । असुर इति नाम्नः चिराय चिरकालेन `चिराय चिररात्राय चिरस्याद्याश्चिरार्थकाः` इत्यमरः । प्रथमाभिधेयतामुपेयुषा अन्वर्थतया मुख्यार्थतां गतेन तरस्विना बलवता । `तरसी बलरंहसी` इति विश्वः । येन हिरण्यकशिपुना दिवि सीदन्तीति द्युसदां देवानां मनस्सु भयस्य पूर्वावतरः प्रथमप्रवेशः । `ॠदोरप्` (अष्टाध्यायी ३.३.५७ ) । न्यधीयत निहितः । धाञः कर्मणि लिङ् । अस्मादेव देवानां प्रथमं भयस्योत्पत्तिरभूदित्यर्थः
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | म | त्स | रे | णा | सु | र | इ | त्यु | पे | यु | षा |
| चि | रा | य | ना | म्नः | प्र | थ | मा | भि | धे | य | तां |
| भ | य | स्य | पू | र्वा | व | त | र | स्त | र | स्वि | ना |
| म | न | स्तु | ये | न | द्यु | स | दां | न्य | धी | य | त |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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