निजोजसोज्जासयितुं जगद्रहा-
मुपजिहीथा न महीतले यदि ।
समाहितैरप्यनिरूपितस्ततः
पदं दृशः स्याः कथमीश मादृशाम् ॥
निजोजसोज्जासयितुं जगद्रहा-
मुपजिहीथा न महीतले यदि ।
समाहितैरप्यनिरूपितस्ततः
पदं दृशः स्याः कथमीश मादृशाम् ॥
मुपजिहीथा न महीतले यदि ।
समाहितैरप्यनिरूपितस्ततः
पदं दृशः स्याः कथमीश मादृशाम् ॥
मल्लिनाथः
निजेति ॥ निजौजसा स्वतेजसा जगद्भ्यो द्रुह्यन्तीति जगद्रुहः कंसादयः। `सत्सूद्विष-` (अष्टाध्यायी ३.२.६१ ) इत्यादिना क्विप् । तेषां उज्जासयितुम् । तान् हिंसितुमित्यर्थः । `जासिनिप्रहण-` (अष्टाध्यायी २.३.५६ ) इत्यादिना कर्मणि शेषे षष्ठी । `जसु हिंसायाम् इति चुरादिः । महीतलं नोपाजिहीथा यदि नावतरेश्चेत् । `ओहाङ् गतौ` लङि थासि रूपम् । ततस्तर्हि समाहितैः समाधिनिष्ठैरपि सकर्मकादप्याशितादिवदविवक्षिते कर्मणि कर्तरि क्तः । अथवा समाहितैः । समाहितचित्तैरित्यर्थः । विभक्तधनेषु `विभक्ता भ्रातरः` इतिवदुत्तरपदलोपो द्रष्टव्यः । `गम्यमानार्थस्याप्रयोग एव लोपः` इति कैयटः । अनिरूपितोऽगृहीतस्त्वमीश, मादृशाम् । चर्मचक्षुषामिति भावः । विनयोक्तिरियम् । दृशो दृष्टेः पदं गोचरः कथं स्याः । न कथंचिदित्यर्थः । तस्मात्वत्साक्षात्कार एवागमनप्रयोजनमिति भावः
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नि | जो | ज | सो | ज्जा | स | यि | तुं | ज | ग | द्र | हा |
| मु | प | जि | ही | था | न | म | ही | त | ले | य | दि |
| स | मा | हि | तै | र | प्य | नि | रू | पि | त | स्त | तः |
| प | दं | दृ | शः | स्याः | क | थ | मी | श | मा | दृ | शाम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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