इतिब्रुवन्तंउवाच स व्रती
न वाच्यमित्थं पुरुषोत्तम त्वया ।
त्वमेव साक्षात्करणीय इत्यतः
किमस्ति कार्यं गुरु योगिनामपि ॥
इतिब्रुवन्तंउवाच स व्रती
न वाच्यमित्थं पुरुषोत्तम त्वया ।
त्वमेव साक्षात्करणीय इत्यतः
किमस्ति कार्यं गुरु योगिनामपि ॥
न वाच्यमित्थं पुरुषोत्तम त्वया ।
त्वमेव साक्षात्करणीय इत्यतः
किमस्ति कार्यं गुरु योगिनामपि ॥
मल्लिनाथः
इति ब्रुवन्तमिति ॥ इति बुवन्तं तं हरिं स व्रती मुनिरुवाच । किमिति । हे पुरुषोत्तम पुरुषेषु श्रेष्ठ । `न निर्धारणे` इति षष्ठीसमासप्रतिषेधः । त्वया इत्थं `गतस्पृहोऽपि` इति न वाच्यम् । निस्पृहस्याप्यत्र प्रयोजनसंभवादिति भावः । तदेवाह । योगिनामपि त्वमेव साक्षात्करणीयः प्रत्यक्षीकर्तव्य इत्यतोऽस्मादन्यद्गुरु कार्यं किमस्ति । न किंचिदित्यर्थः । तस्मान्न प्रयोजनान्तरप्रश्नावकाश इति भावः
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | ति | ब्रु | व | न्तं | उ | वा | च | स | व्र | ती | |
| न | वा | च्य | मि | त्थं | पु | रु | षो | त्त | म | त्व | या |
| त्व | मे | व | सा | क्षा | त्क | र | णी | य | इ | त्य | तः |
| कि | म | स्ति | का | र्यं | गु | रु | यो | गि | ना | म | पि |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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