गतस्पृहोऽप्यागमनप्रयोजनं
वदेति वक्तुं व्यवसीयते यया ।
तनोति नस्तामुदित्मगौरवो
गुरुस्तवैवागम एव धृष्यताम् ॥
गतस्पृहोऽप्यागमनप्रयोजनं
वदेति वक्तुं व्यवसीयते यया ।
तनोति नस्तामुदित्मगौरवो
गुरुस्तवैवागम एव धृष्यताम् ॥
वदेति वक्तुं व्यवसीयते यया ।
तनोति नस्तामुदित्मगौरवो
गुरुस्तवैवागम एव धृष्यताम् ॥
मल्लिनाथः
गतस्पृहोऽपीति ॥ गतस्पृहो विरक्तोऽपि त्वमागमनप्रयोजनं वदेति वक्तुं यया धृष्टतया व्यवसीयत उद्यम्यते । स्यतेर्भावे लट् । उदितमुत्पन्नमुक्तं वा आत्मनो मम गौरवं येन स गुरुः श्लाघ्य एष तवागम आगमनमेव नोऽस्माकं धृष्टतां तनोति विस्तारयति । `तनु विस्तारे` लट् । भवतो निस्पृहत्वेऽपि प्रेक्षावत्प्रवृत्तेः प्रयोजनव्याप्त्या सावकाशः प्रश्न इति भावः
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ग | त | स्पृ | हो | ऽप्या | ग | म | न | प्र | यो | ज | नं |
| व | दे | ति | व | क्तुं | व्य | व | सी | य | ते | य | या |
| त | नो | ति | न | स्ता | मु | दि | त्म | गौ | र | वो | |
| गु | रु | स्त | वै | वा | ग | म | ए | व | धृ | ष्य | ताम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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