जगत्पर्याप्तसहस्रभानुना
न यन्नियन्तुं समभावि भानुना ।
प्रसह्य तेजोभिरसंख्यतां गतै-
रदस्त्वया नुन्नमनुत्तमं तमः ॥
जगत्पर्याप्तसहस्रभानुना
न यन्नियन्तुं समभावि भानुना ।
प्रसह्य तेजोभिरसंख्यतां गतै-
रदस्त्वया नुन्नमनुत्तमं तमः ॥
न यन्नियन्तुं समभावि भानुना ।
प्रसह्य तेजोभिरसंख्यतां गतै-
रदस्त्वया नुन्नमनुत्तमं तमः ॥
मल्लिनाथः
जगतीति ॥ जगत्यपर्याप्ता अपरिच्छिन्नाः सहस्रं भानवोंऽशवो यस्य तेन भानुनार्केण । `भानवोऽर्कहरांशवः` इति वैजयन्ती । यत्तमो नियन्तुं निवारयितुं न समभावि न शेके । भावे लुङ् । अविद्यमानमुत्तमं यस्मात्तदनुत्तमं सर्वाधिकम् अदस्तमो मोहात्मकसंख्यतां गतैस्तेजोभिः प्रसह्य बलात्त्वया नुन्नं छिन्नम् । अतः श्लाघ्यदर्शनो भवानिति भावः । `नुदविद-` इत्यादिना विकल्पान्निष्टानत्वभावः । अत्रोपमानाद्भानोर्मुनेराधिक्यप्रतिपादनाद्व्यतिरेकालंकारः
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ज | ग | त्प | र्या | प्त | स | ह | स्र | भा | नु | ना | |
| न | य | न्नि | य | न्तुं | स | म | भा | वि | भा | नु | ना |
| प्र | स | ह्य | ते | जो | भि | र | सं | ख्य | तां | ग | तै |
| र | द | स्त्व | या | नु | न्न | म | नु | त्त | मं | त | मः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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