हरत्यघं संप्रति हेतुरेष्यतः
शुभस्य पूर्वाचरितै कृतर्ं शुभै ।
शरीरभाजां भवदीयदर्शनं
व्यनक्ति कालत्रितयेऽपि योग्यताम् ॥
हरत्यघं संप्रति हेतुरेष्यतः
शुभस्य पूर्वाचरितै कृतर्ं शुभै ।
शरीरभाजां भवदीयदर्शनं
व्यनक्ति कालत्रितयेऽपि योग्यताम् ॥
शुभस्य पूर्वाचरितै कृतर्ं शुभै ।
शरीरभाजां भवदीयदर्शनं
व्यनक्ति कालत्रितयेऽपि योग्यताम् ॥
मल्लिनाथः
हरतीति ॥ भवदीयदर्शनं शरीरभाजाम् । द्रष्टृृणामित्यर्थः । `भजो ण्विः` (अष्टाध्यायी ३.२.६२ ) । कालत्रितये भूतादिकालत्रितयेऽपि योग्यतां पवित्रतां व्यनक्ति गमयति । कुतः-संप्रति दर्शनकाले अघं पापं हरति । एष्यतो भाविनः शुभस्य श्रेयसो हेतुः । तथा पूर्वाचरितैः प्रागनुष्ठितैः शुभैः सुकृतैः कृतम् । एवं त्रैकाल्येऽपि कार्यत्वेन कारणत्वेन च पुंसि सुकृतसमवायमवगमयते । अत एतादृशं दर्शनं कस्य न प्रार्थ्यमिति भावः । अत्र हरतीत्यादिवाक्यत्रयस्यार्थस्य शरीरेत्यादिवाक्यत्रयोक्त्या वाक्यार्थहेतुकं काव्यलिङ्गमलंकारः
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ह | र | त्य | घं | सं | प्र | ति | हे | तु | रे | ष्य | तः | |
| शु | भ | स्य | पू | र्वा | च | रि | तै | कृ | त | र्ं | शु | भै |
| श | री | र | भा | जां | भ | व | दी | य | द | र्श | नं | |
| व्य | न | क्ति | का | ल | त्रि | त | ये | ऽपि | यो | ग्य | ताम् | |
| ज | त | ज | र | |||||||||
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