निदाधधामानमिवाधिदीधितिं
मुदाविकासं मुनिमभ्युपेयुषी ।
विलोचने बिभ्रदधिश्रितश्रिणी
स पुण्डराकाक्ष इति स्फुटाभवत् ॥
निदाधधामानमिवाधिदीधितिं
मुदाविकासं मुनिमभ्युपेयुषी ।
विलोचने बिभ्रदधिश्रितश्रिणी
स पुण्डराकाक्ष इति स्फुटाभवत् ॥
मुदाविकासं मुनिमभ्युपेयुषी ।
विलोचने बिभ्रदधिश्रितश्रिणी
स पुण्डराकाक्ष इति स्फुटाभवत् ॥
मल्लिनाथः
निदाघेति ॥ निदाघमुष्णं धाम किरणा यस्य तथोक्तम् । `निदाघो ग्रीष्मकाले स्यादुष्णस्वेदाम्बुनोरपि` इति विश्वः । अर्कमिवाधिदीधितिमधिकतेजसं मुनिमभिलक्ष्य । `अभिरभागे` इति लक्षणे कर्मप्रवचनीयसंज्ञा `कर्मप्रवचनीययुक्ते द्वितीया`। (अष्टाध्यायी २.३.८ ) मुदा विकासमुपेयुषी उपगते । क्कसुप्रत्ययान्तो निपातः । अत एवाधिश्रिता प्राप्ता श्रीर्याभ्यां ते तथोक्ते। `इकोऽचि विभक्तौ` (अष्टाध्यायी ७.१.७३ ) इति नुमागमः। विलोचने बिभ्रत् । `नाभ्यस्ताच्छतुः` (अष्टाध्यायी ७.१.७८ ) इति नुमभावः । स हरिः पुण्डरीकाक्ष इत्येवं स्फुटोऽभवत् । सूर्यसंनिधाने श्रीविकासभावादक्ष्णां पुण्डरीकसाधर्म्यात् । पुण्डरीके इवाक्षिणी यस्येत्यवयवार्थलाभे पुण्डरीकाक्ष इति व्यक्तम् । अन्वर्थसंज्ञोऽभूदित्यर्थः । बिभ्रत्स्फुटोऽभवदिति पदार्थहेतुकस्य काव्यलिङ्गस्य निदाघधामानमिवेत्युपमासापेक्षत्वादनयोरङ्गाङ्गिभावेन संकरः
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नि | दा | ध | धा | मा | न | मि | वा | धि | दी | धि | तिं |
| मु | दा | वि | का | सं | मु | नि | म | भ्यु | पे | यु | षी |
| वि | लो | च | ने | बि | भ्र | द | धि | श्रि | त | श्रि | णी |
| स | पु | ण्ड | रा | का | क्ष | इ | ति | स्फु | टा | भ | वत् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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