युगान्तकालमतिसंहृतात्मनो
जगन्ति यस्यां सविकासमासत ।
तनौ ममुस्तत्र न कैटभद्विष-
स्तपोधनभ्यागमसंभवा मुदः ॥
युगान्तकालमतिसंहृतात्मनो
जगन्ति यस्यां सविकासमासत ।
तनौ ममुस्तत्र न कैटभद्विष-
स्तपोधनभ्यागमसंभवा मुदः ॥
जगन्ति यस्यां सविकासमासत ।
तनौ ममुस्तत्र न कैटभद्विष-
स्तपोधनभ्यागमसंभवा मुदः ॥
मल्लिनाथः
युगान्तेति ॥ युगान्तकाले प्रतिसंहृतात्मनः आत्मन्युपसंहृता आत्मानो जीवा येन तस्य कैटभद्विषो हरेर्यस्यां तनौ जगन्ति सविकासं सविस्तरमासतातिष्ठन् । `आस उपवेशने` लङ् । तत्र तनौ देहे तपोधनाभ्यागमेन संभवन्तीति संभवाः संभूताः । पचाद्यच् । मुदः संतोषा न ममुः । अतिरिच्यन्ते स्मेत्यर्थः । चतुर्दशभुवनभरणपर्याप्ते वपुषि अन्तर्न मान्तीति कविप्रौढोक्तिसिद्धातिशयेन स्वतःसिद्धस्याभेदेनाध्यवसितातिशयोक्तिः, सा च मुदामन्तःसंबन्धेऽप्यसंबन्धोक्त्या संबन्धासंबन्धरूपा
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| यु | गा | न्त | का | ल | म | ति | सं | हृ | ता | त्म | नो |
| ज | ग | न्ति | य | स्यां | स | वि | का | स | मा | स | त |
| त | नौ | म | मु | स्त | त्र | न | कै | ट | भ | द्वि | ष |
| स्त | पो | ध | न | भ्या | ग | म | सं | भ | वा | मु | दः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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