रथाङ्गपाणेः पटलेन रोचिषा-
मृषित्विषः संवलिता विरेजिरे ।
चलत्पलाशान्तरगोचरस्तरो-
तुषारमूर्तेरिव नक्तमंशवः ॥
रथाङ्गपाणेः पटलेन रोचिषा-
मृषित्विषः संवलिता विरेजिरे ।
चलत्पलाशान्तरगोचरस्तरो-
तुषारमूर्तेरिव नक्तमंशवः ॥
मृषित्विषः संवलिता विरेजिरे ।
चलत्पलाशान्तरगोचरस्तरो-
तुषारमूर्तेरिव नक्तमंशवः ॥
मल्लिनाथः
रथाङ्गपाणेरिति ॥ रथाङ्गं चक्रं पाणौ यस्य तस्य हरेः । `प्रहरणार्थेभ्यः परे निष्ठासप्तम्यौ भवतः` (वा०) इति पाणेः परनिपातः । रोचिषां छवीनां पटलेन समूहेन संवलिता मिलिता ऋषित्विषो नक्तं रात्रौ । सप्तम्यर्थेऽव्ययम् । तरोश्चलतां पलाशानां पत्राणामन्तराणि विवराणि गोचर आश्रयो येषां ते, तुषारा मूर्तिर्यस्य तस्येन्दोरंशव इव विरेजिरे चकाशिरे
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| र | था | ङ्ग | पा | णेः | प | ट | ले | न | रो | चि | षा |
| मृ | षि | त्वि | षः | सं | व | लि | ता | वि | रे | जि | रे |
| च | ल | त्प | ला | शा | न्त | र | गो | च | र | स्त | रो |
| तु | षा | र | मू | र्ते | रि | व | न | क्त | मं | श | वः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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