अशेषतीर्थोपहृताः कमण्डलो-
र्निधाय पाणावृषीणाभ्युदीरिताः ।
अघौघविध्वंसविधौ पटीयसी-
र्नतेन मूर्द्ना हरिरग्रहीदापः ॥
अशेषतीर्थोपहृताः कमण्डलो-
र्निधाय पाणावृषीणाभ्युदीरिताः ।
अघौघविध्वंसविधौ पटीयसी-
र्नतेन मूर्द्ना हरिरग्रहीदापः ॥
र्निधाय पाणावृषीणाभ्युदीरिताः ।
अघौघविध्वंसविधौ पटीयसी-
र्नतेन मूर्द्ना हरिरग्रहीदापः ॥
मल्लिनाथः
अशेषेति ॥ अशेषेभ्यस्तीर्थेभ्य उपहृता आहृतास्तथा । कमण्डलोरुदकपात्रादुद्धृत्येत्यर्थः । पाणौ निधाय क्रियान्तराक्षिप्तक्रियापेक्षया कमण्डलोरपादानत्वम् । `अस्त्री कमण्डलुः कुण्डी` इत्यमरः । ऋषिणाभ्युदीरिता आक्षिप्ता अत एवाघौघानां पापसमूहानां विध्वंसविधौ विनाशकरणे पटीयसीः समर्थतराः। पटुशब्दादीयसुनि `उगितश्च` (अष्टाध्यायी ४.१.६ ) इति ङीप् । अपो जलानि हरिर्नतेन मूर्ध्नाग्रहीत्स्वीकृतवान् । ग्रहेर्लुङ्
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | शे | ष | ती | र्थो | प | हृ | ताः | क | म | ण्ड | लो |
| र्नि | धा | य | पा | णा | वृ | षी | णा | भ्यु | दी | रि | ताः |
| अ | घौ | घ | वि | ध्वं | स | वि | धौ | प | टी | य | सी |
| र्न | ते | न | मू | र्द्ना | ह | रि | र | ग्र | ही | दा | पः |
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