न यावदेतावुदपश्यदुत्थितौ
जनस्तुषाराञ्जनपर्वताविव ।
स्वहस्तदत्ते मुनिमासने
मुनिश्चिरंस्तावदभिन्यवीविशत् ॥
न यावदेतावुदपश्यदुत्थितौ
जनस्तुषाराञ्जनपर्वताविव ।
स्वहस्तदत्ते मुनिमासने
मुनिश्चिरंस्तावदभिन्यवीविशत् ॥
जनस्तुषाराञ्जनपर्वताविव ।
स्वहस्तदत्ते मुनिमासने
मुनिश्चिरंस्तावदभिन्यवीविशत् ॥
मल्लिनाथः
न यावदिति ॥ उत्थितावेतौ मुनिकृष्णौ जनस्तुषाराञ्जनयोः पर्वताविव यावन्नोदपश्यन्नोत्प्रेक्षितवान् । तावच्चिरंतनः पुराणो मुनिः कृष्णः `पुरा किल भगवान्बदरिकारण्ये नारायणावतारेण तपसि स्थितवान्` इति पुराणात् । `सायंचिरम्-` (अष्टाध्यायी ४.३.२३ ) इत्यादिना ट्युप्रत्ययस्तुडागमश्च । स्वहस्तेन दत्ते आसने मुनिं नारदमभिन्यवीविशत् स्वाभिमुखेनोपवेशितवान् । अभिनिपूर्वाद्विशतेर्ण्यन्ताल्लुङि "णिश्रि-` (अष्टाध्यायी ३.१.४८ ) इति चङ्
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| न | या | व | दे | ता | वु | द | प | श्य | दु | त्थि | तौ |
| ज | न | स्तु | षा | रा | ञ्ज | न | प | र्व | ता | वि | व |
| स्व | ह | स्त | द | त्ते | मु | नि | मा | स | ने | ||
| मु | नि | श्चि | रं | स्ता | व | द | भि | न्य | वी | वि | शत् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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