अथ प्रयत्नोन्नमितानत्फणै-
र्धृते कथञ्चित्फणिनां गणैरधः ।
न्यधायिषातामभि देवकीसुतं
सुतेन धातुश्चरणौ भुवस्तले ॥
अथ प्रयत्नोन्नमितानत्फणै-
र्धृते कथञ्चित्फणिनां गणैरधः ।
न्यधायिषातामभि देवकीसुतं
सुतेन धातुश्चरणौ भुवस्तले ॥
र्धृते कथञ्चित्फणिनां गणैरधः ।
न्यधायिषातामभि देवकीसुतं
सुतेन धातुश्चरणौ भुवस्तले ॥
मल्लिनाथः
अथेति ॥ अथाच्युताभ्युत्थानानन्तरं धातुः सुतेन नारदेन प्रयत्नोन्नमितास्तथापि मुनिपादन्यासभारादानमन्त्यः फणा येषां तैः फणिनां गणैरधोऽधःप्रदेशे कथंचिद्धृते स्थापिते भुवस्तले भूपृष्ठे । अभिदेवकीसुतं देवकीसुतमभि । लक्ष्यीकृत्येत्यर्थः । `लक्षणेनाभिप्रती आभिमुख्ये` (अष्टाध्यायी २.१.१४ ) इत्यव्ययीभावः । चरणौ पदौ । `पदङ्घ्रिश्चरणोऽस्त्रियाम्` इत्यमरः । न्यधायिषातां निहितौ । दधातेः कर्मणि लुङ् । `स्यसिच्सी-` (अष्टाध्यायी ६.४.६२ ) इत्यादिना चिण्वदिटि युक् । अत्र फणानां नमनोन्नमनासंबन्धेऽपि मुनिगौरवाय तत्संबन्धाभिधानादतिशयोक्तिभेदः
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | थ | प्र | य | त्नो | न्न | मि | ता | न | त्फ | णै | |
| र्धृ | ते | क | थ | ञ्चि | त्फ | णि | नां | ग | णै | र | धः |
| न्य | धा | यि | षा | ता | म | भि | दे | व | की | सु | तं |
| सु | ते | न | धा | तु | श्च | र | णौ | भु | व | स्त | ले |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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