भिक्षासी जनमध्यसङ्गरहितः स्वायत्तचेष्टः सदा
हानादानविरक्तमार्गनिरतः कश्चित्तपस्वी स्थितः ।
रथ्याकीर्णविशीर्णजीर्णवसनः सम्प्राप्तकन्थासनो
निर्मानो निरहङ्कृतिः शमसुखाभोगैकबद्धस्पृहः ॥
भिक्षासी जनमध्यसङ्गरहितः स्वायत्तचेष्टः सदा
हानादानविरक्तमार्गनिरतः कश्चित्तपस्वी स्थितः ।
रथ्याकीर्णविशीर्णजीर्णवसनः सम्प्राप्तकन्थासनो
निर्मानो निरहङ्कृतिः शमसुखाभोगैकबद्धस्पृहः ॥
हानादानविरक्तमार्गनिरतः कश्चित्तपस्वी स्थितः ।
रथ्याकीर्णविशीर्णजीर्णवसनः सम्प्राप्तकन्थासनो
निर्मानो निरहङ्कृतिः शमसुखाभोगैकबद्धस्पृहः ॥
अन्वयः
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कश्चित् तपस्वी भिक्षा-अशी, जन-मध्य-सङ्ग-रहितः, सदा स्व-आयत्त-चेष्टः, हान-आदान-विरक्त-मार्ग-निरतः, रथ्या-आकीर्ण-विशीर्ण-जीर्ण-वसनः, सम्प्राप्त-कन्था-आसनः, निः-मानः, निः-अहङ्कृतिः, शम-सुख-आभोग-एक-बद्ध-स्पृहः (सन्) स्थितः ।
Summary
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There lives a certain ascetic who eats alms, is free from social attachments, always acts independently, is devoted to the path of renunciation, wears tattered clothes found scattered on the streets, has a ragged mat for a seat, is free from pride and ego, and whose only desire is fixed on the experience of blissful tranquility.
सारांश
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वह तपस्वी धन्य है जो भिक्षा पर आश्रित, जनसमूह से दूर और लाभ-हानि से पूर्णतः विरक्त है। फटे-पुराने वस्त्रों को धारण करने वाला और पृथ्वी को ही आसन मानने वाला वह अहंकार रहित साधक केवल आत्मिक शांति के सुख की कामना में लीन रहता है।
पदच्छेदः
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| भिक्षासी | भिक्षा–अशिन् (१.१) | eating alms |
| जन-मध्य-सङ्ग-रहितः | जन–मध्य–सङ्ग–रहित (१.१) | free from social attachments |
| स्वायत्त-चेष्टः | स्व–आयत्त–चेष्ट (१.१) | whose actions are self-controlled |
| सदा | सदा | always |
| हाना-दान-विरक्त-मार्ग-निरतः | हान–आदान–विरक्त–मार्ग–निरत (१.१) | devoted to the path of renunciation (of giving and taking) |
| कश्चित् | कश्चित् (१.१) | a certain |
| तपस्वी | तपस्विन् (१.१) | ascetic |
| स्थितः | स्थित (√स्था+क्त, १.१) | lives |
| रथ्याकीर्ण-विशीर्ण-जीर्ण-वसनः | रथ्या–आकीर्ण–विशीर्ण–जीर्ण–वसन (१.१) | wearing tattered clothes found scattered on the streets |
| सम्प्राप्त-कन्थासनः | सम्प्राप्त–कन्था–आसन (१.१) | who has obtained a ragged mat for a seat |
| निर्मानः | निर्–मान (१.१) | free from pride |
| निरहङ्कृतिः | निर्–अहङ्कृति (१.१) | free from ego |
| शम-सुखाभोगैक-बद्ध-स्पृहः | शम–सुख–आभोग–एक–बद्ध–स्पृह (१.१) | whose only desire is fixed on the experience of blissful tranquility |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| भि | क्षा | सी | ज | न | म | ध्य | स | ङ्ग | र | हि | तः | स्वा | य | त्त | चे | ष्टः | स | दा |
| हा | ना | दा | न | वि | र | क्त | मा | र्ग | नि | र | तः | क | श्चि | त्त | प | स्वी | स्थि | तः |
| र | थ्या | की | र्ण | वि | शी | र्ण | जी | र्ण | व | स | नः | स | म्प्रा | प्त | क | न्था | स | नो |
| नि | र्मा | नो | नि | र | ह | ङ्कृ | तिः | श | म | सु | खा | भो | गै | क | ब | द्ध | स्पृ | हः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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