विवेकव्याकोशे विदधति समे शाम्यति तृषा
परिष्वङ्गे तुङ्गे प्रसरतितरां सा परिणता ।
जराजीर्णैश्वर्यग्रसनगहनाक्षेपकृपण-
स्तृषापात्रं यस्यां भवति मरुतामप्यधिपतिः ॥
विवेकव्याकोशे विदधति समे शाम्यति तृषा
परिष्वङ्गे तुङ्गे प्रसरतितरां सा परिणता ।
जराजीर्णैश्वर्यग्रसनगहनाक्षेपकृपण-
स्तृषापात्रं यस्यां भवति मरुतामप्यधिपतिः ॥
परिष्वङ्गे तुङ्गे प्रसरतितरां सा परिणता ।
जराजीर्णैश्वर्यग्रसनगहनाक्षेपकृपण-
स्तृषापात्रं यस्यां भवति मरुतामप्यधिपतिः ॥
अन्वयः
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विवेक-व्याकोशे समे विदधति, तृषा शाम्यति। तुङ्गे परिष्वङ्गे (सति) सा परिणता सतीतरां प्रसरति। यस्यां मरुताम् अधिपतिः अपि जरा-जीर्ण-ऐश्वर्य-ग्रसन-गहन-आक्षेप-कृपणः तृषापात्रं भवति।
Summary
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When discrimination blossoms and equanimity is established, desire is pacified. But when embraced by lofty wisdom, that matured desire spreads all the more. In this state, even Indra, the lord of gods, becomes a miserable object of desire, lamenting the deep affliction of devouring his age-decayed lordship.
सारांश
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विवेक जाग्रत होने पर तृष्णा शांत होती है, अन्यथा विषयों के संसर्ग में यह इंद्र जैसे देवताओं को भी याचक बना देती है।
पदच्छेदः
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| विवेक | विवेक | discrimination |
| व्याकोशे | व्याकोश (७.१) | in the blossoming of |
| विदधति | विदधत् (वि√धा+शतृ, ७.१) | while being established |
| समे | सम (७.१) | in equanimity |
| शाम्यति | शाम्यति (√शम् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | is pacified |
| तृषा | तृष् (१.१) | thirst (desire) |
| परिष्वङ्गे | परिष्वङ्ग (७.१) | in the embrace |
| तुङ्गे | तुङ्ग (७.१) | of the lofty (wisdom) |
| प्रसरति | प्रसरति (प्र√सृ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | spreads |
| तराम् | तराम् | all the more |
| सा | तद् (१.१) | it |
| परिणता | परिणत (परि√नम्+क्त, १.१) | matured |
| जरा | जरा | old age |
| जीर्ण | जीर्ण (√जॄ+क्त) | decayed |
| ऐश्वर्य | ऐश्वर्य | lordship |
| ग्रसन | ग्रसन | devouring |
| गहन | गहन | deep |
| आक्षेप | आक्षेप | reproach |
| कृपणः | कृपण (१.१) | miserable through |
| तृषा | तृष् | desire |
| पात्रम् | पात्र (२.१) | an object of |
| यस्याम् | यद् (७.१) | in which (state) |
| भवति | भवति (√भू कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | becomes |
| मरुताम् | मरुत् (६.३) | of the gods |
| अपि | अपि | even |
| अधिपतिः | अधिपति (१.१) | the lord (Indra) |
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | वे | क | व्या | को | शे | वि | द | ध | ति | स | मे | शा | म्य | ति | तृ | षा |
| प | रि | ष्व | ङ्गे | तु | ङ्गे | प्र | स | र | ति | त | रां | सा | प | रि | ण | ता |
| ज | रा | जी | र्णै | श्व | र्य | ग्र | स | न | ग | ह | ना | क्षे | प | कृ | प | ण |
| स्तृ | षा | पा | त्रं | य | स्यां | भ | व | ति | म | रु | ता | म | प्य | धि | प | तिः |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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