महादेवो देवः सरिदपि च सैषा सुरसरि-
द्गुहा एवागारं वसनमपि ता एव हरितः ।
सुहृदा कालोऽयं व्रत्मिदमदैन्यव्रतमिदं
कियद्वा वक्ष्यामो वटविटप एवास्तु दयिता ॥
महादेवो देवः सरिदपि च सैषा सुरसरि-
द्गुहा एवागारं वसनमपि ता एव हरितः ।
सुहृदा कालोऽयं व्रत्मिदमदैन्यव्रतमिदं
कियद्वा वक्ष्यामो वटविटप एवास्तु दयिता ॥
द्गुहा एवागारं वसनमपि ता एव हरितः ।
सुहृदा कालोऽयं व्रत्मिदमदैन्यव्रतमिदं
कियद्वा वक्ष्यामो वटविटप एवास्तु दयिता ॥
अन्वयः
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देवः महादेवः (अस्ति) । सरित् अपि च सा एषा सुरसरित् (अस्ति) । गुहा एव आगारम् (अस्ति) । वसनम् अपि ताः एव हरितः (सन्ति) । सुहृत् वा अयम् कालः (अस्ति) । इदम् व्रतम् अदैन्य-व्रतम् (अस्ति) । कियत् वा वक्ष्यामः? वट-विटपः एव दयिता अस्तु ।
Summary
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For the ascetic, the god is Mahadeva. The river is the celestial Ganges. The cave is the home, and the directions are the clothes. Time is the friend, and the vow is that of non-meanness. What more can be said? Let the banyan tree be the beloved.
सारांश
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महादेव ही देव हों, गंगा तट निवास हो, दिशाएँ वस्त्र हों और एकांत ही जीवन हो। संतोष का व्रत धारण कर वन में रहना ही सबसे बड़ा सुख है, जहाँ प्रकृति ही सब कुछ है।
पदच्छेदः
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| महादेवः | महा–देव (१.१) | Mahadeva |
| देवः | देव (१.१) | is the God |
| सरित् | सरित् (१.१) | the river |
| अपि | अपि | also |
| च | च | and |
| सा | तद् (१.१) | that |
| एषा | एतद् (१.१) | this |
| सुर-सरित् | सुर–सरित् (१.१) | is the celestial river |
| गुहा | गुहा (१.१) | a cave |
| एव | एव | is indeed |
| आगारं | आगार (१.१) | the home |
| वसनम् | वसन (१.१) | clothing |
| अपि | अपि | also |
| ताः | तद् (१.३) | those |
| एव | एव | indeed |
| हरितः | हरित् (१.३) | are the directions |
| सुहृत् | सुहृद् (१.१) | a friend |
| वा | वा | or |
| कालः | काल (१.१) | time |
| अयम् | इदम् (१.१) | is this |
| व्रतम् | व्रत (१.१) | the vow |
| इदम् | इदम् (१.१) | this |
| अदैन्य-व्रतम् | अदैन्य–व्रत (१.१) | is the vow of non-meanness |
| इदम् | इदम् (१.१) | this |
| कियत् | कियत् | how much |
| वा | वा | more |
| वक्ष्यामः | वक्ष्यामः (√वच् कर्तरि लृट् (परस्मै.) उ.पु. बहु.) | shall we say |
| वट-विटपः | वट–विटप (१.१) | the banyan tree |
| एव | एव | alone |
| अस्तु | अस्तु (√अस् कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | let it be |
| दयिता | दयिता (१.१) | the beloved |
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म | हा | दे | वो | दे | वः | स | रि | द | पि | च | सै | षा | सु | र | स | रि |
| द्गु | हा | ए | वा | गा | रं | व | स | न | म | पि | ता | ए | व | ह | रि | तः |
| सु | हृ | दा | का | लो | ऽयं | व्र | त्मि | द | म | दै | न्य | व्र | त | मि | दं | |
| कि | य | द्वा | व | क्ष्या | मो | व | ट | वि | ट | प | ए | वा | स्तु | द | यि | ता |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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