भक्तिर्भवे मरणजन्मभयं हृदिस्थं
स्नेहो न बन्धुषु न मन्मथजा विकाराः ।
संसर्ज दोषरहिता विजया वनान्ता
वैराग्यमस्ति किमितः परमर्थनीयम् ॥

अन्वयः AI भवे भक्तिः, हृदि-स्थम् मरण-जन्म-भयम्, बन्धुषु स्नेहः न, मन्मथजाः विकाराः न, संसर्ग-दोष-रहिताः विजयाः वनान्ताः, (च यदि) वैराग्यम् अस्ति, (तर्हि) इतः परम् किम् अर्थनीयम्?
Summary AI Devotion to Shiva, fear of birth and death in the heart, no affection for relatives, no agitations born of passion, solitary forest regions free from the faults of association, and dispassion—if these exist, what more is there to be sought?
सारांश AI शिव में अनन्य भक्ति, जन्म-मरण का भय, सांसारिक मोह का अभाव और वन का एकांत—वैराग्य के इस परम सुख के अतिरिक्त अब और क्या पाने योग्य शेष है?
पदच्छेदः AI
भक्तिःभक्ति (१.१) devotion
भवेभव (७.१) to Shiva
मरण-जन्म-भयम्मरणजन्मभय (१.१) fear of death and birth
हृदि-स्थम्हृदिस्थ (१.१) situated in the heart
स्नेहःस्नेह (१.१) affection
not
बन्धुषुबन्धु (७.३) for relatives
not
मन्मथजाःमन्मथज (१.३) born of passion
विकाराःविकार (१.३) agitations
संसर्ग-दोष-रहिताःसंसर्गदोषरहित (१.३) free from the faults of association
विजयाःविजय (१.३) solitary/victorious
वनान्ताःवनान्त (१.३) forest regions
वैराग्यम्वैराग्य (१.१) dispassion
अस्तिअस्ति (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) there is
किम्किम् (१.१) what
इतःइतस् than this
परम्पर (१.१) more
अर्थनीयम्अर्थनीय (√अर्थ्+णिच्+अनीयर्, १.१) to be sought
छन्दः वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११ १२ १३ १४
क्ति र्भ वे न्म यं हृ दि स्थं
स्ने हो न्धु षु न्म जा वि का राः
सं र्ज दो हि ता वि या ना न्ता
वै रा ग्य स्ति कि मि तः र्थ नी यम्
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