चेतश्चिन्तय मा रमां सकृदिमामस्थायिनीमास्थया
भूपालभ्रुकुटीकुटीविहरणव्यापारपण्याङ्गनाम् ।
कन्थाकञ्चुकिनः प्रविश्य भवनद्वाराणि वाराणसी-
रथ्या पङ्क्तिषु पाणिपात्रपतितां भिक्षामपेक्षामहे ॥
चेतश्चिन्तय मा रमां सकृदिमामस्थायिनीमास्थया
भूपालभ्रुकुटीकुटीविहरणव्यापारपण्याङ्गनाम् ।
कन्थाकञ्चुकिनः प्रविश्य भवनद्वाराणि वाराणसी-
रथ्या पङ्क्तिषु पाणिपात्रपतितां भिक्षामपेक्षामहे ॥
भूपालभ्रुकुटीकुटीविहरणव्यापारपण्याङ्गनाम् ।
कन्थाकञ्चुकिनः प्रविश्य भवनद्वाराणि वाराणसी-
रथ्या पङ्क्तिषु पाणिपात्रपतितां भिक्षामपेक्षामहे ॥
अन्वयः
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चेतः, भूपाल-भ्रुकुटी-कुटी-विहरण-व्यापार-पण्याङ्गनाम् अस्थायीनीम् इमाम् रमाम् आस्थया सकृत् मा चिन्तय। (वयम्) कन्था-कञ्चुकिनः (सन्तः) वाराणसी-रथ्या-पङ्क्तिषु भवन-द्वाराणि प्रविश्य पाणि-पात्र-पतिताम् भिक्षाम् अपेक्षामहे।
Summary
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O mind, do not think, even once, with regard for this transient goddess of fortune, who is like a prostitute active in the cottages of kings' frowns. We, clad in patched rags, will enter the doors of houses in the streets of Varanasi and seek alms that fall into our cupped hands.
सारांश
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हे मन! राजाओं की भृकुटि पर नाचने वाली इस चंचल लक्ष्मी की चिंता मत करो। हम तो काशी की गलियों में फटे वस्त्र पहनकर भिक्षा पात्र में प्राप्त अन्न से ही संतुष्ट रहना चाहते हैं।
पदच्छेदः
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| चेतः | चेतस् (८.१) | O mind |
| चिन्तय | चिन्तय (√चिन्त् +णिच् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | think of |
| मा | मा | not |
| रमाम् | रमा (२.१) | the goddess of fortune (Lakshmi) |
| सकृत् | सकृत् | even once |
| इमाम् | इदम् (२.१) | this |
| अस्थायिनीम् | अस्थायिनी (२.१) | transient |
| आस्थया | आस्था (३.१) | with regard |
| भूपाल-भ्रुकुटी-कुटी-विहरण-व्यापार-पण्याङ्गनाम् | भूपाल–भ्रुकुटी–कुटी–विहरण–व्यापार–पण्याङ्गना (२.१) | who is a prostitute engaged in the business of wandering in the cottages of kings' frowns |
| कन्था-कञ्चुकिनः | कन्था–कञ्चुकिन् (१.३) | wearing patched garments as armor |
| प्रविश्य | प्रविश्य (प्र√विश्+ल्यप्) | having entered |
| भवन-द्वाराणि | भवन–द्वार (२.३) | the doors of houses |
| वाराणसी-रथ्या-पङ्क्तिषु | वाराणसी–रथ्या–पङ्क्ति (७.३) | in the rows of streets of Varanasi |
| पाणि-पात्र-पतिताम् | पाणि–पात्र–पतित (२.१) | fallen into the bowl of the hands |
| भिक्षाम् | भिक्षा (२.१) | alms |
| अपेक्षामहे | अपेक्षामहे (अप√ईक्ष् कर्तरि लट् (आत्मने.) उ.पु. बहु.) | we shall seek |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| चे | त | श्चि | न्त | य | मा | र | मां | स | कृ | दि | मा | म | स्था | यि | नी | मा | स्थ | या |
| भू | पा | ल | भ्रु | कु | टी | कु | टी | वि | ह | र | ण | व्या | पा | र | प | ण्या | ङ्ग | नाम् |
| क | न्था | क | ञ्चु | कि | नः | प्र | वि | श्य | भ | व | न | द्वा | रा | णि | वा | रा | ण | सी |
| र | थ्या | प | ङ्क्ति | षु | पा | णि | पा | त्र | प | ति | तां | भि | क्षा | म | पे | क्षा | म | हे |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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