सत्यामेव त्रिलोकीसरिति हरशिरश्चुम्बिनीवच्छटायां
सद्वृत्तिं कल्पयन्त्यां बटविटपभवैर्वल्कलैः सत्फलैश्च ।
कोऽयं विद्वान्विपत्तिज्वरजनितरुजातीवदुःखासिकानां
वक्त्रं वीक्षेत दुःस्थे यदि हि न विभृयात्स्वे कुटुम्बेऽनुकम्पाम् ॥
सत्यामेव त्रिलोकीसरिति हरशिरश्चुम्बिनीवच्छटायां
सद्वृत्तिं कल्पयन्त्यां बटविटपभवैर्वल्कलैः सत्फलैश्च ।
कोऽयं विद्वान्विपत्तिज्वरजनितरुजातीवदुःखासिकानां
वक्त्रं वीक्षेत दुःस्थे यदि हि न विभृयात्स्वे कुटुम्बेऽनुकम्पाम् ॥
सद्वृत्तिं कल्पयन्त्यां बटविटपभवैर्वल्कलैः सत्फलैश्च ।
कोऽयं विद्वान्विपत्तिज्वरजनितरुजातीवदुःखासिकानां
वक्त्रं वीक्षेत दुःस्थे यदि हि न विभृयात्स्वे कुटुम्बेऽनुकम्पाम् ॥
अन्वयः
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हर-शिरः-चुम्बिनी-अवच्छटायाम् त्रिलोकी-सरिति (गङ्गायाम्) बट-विटप-भवैः वल्कलैः सत्-फलैः च सत्-वृत्तिम् कल्पयन्त्याम् सत्याम् एव, अयम् कः विद्वान् दुःस्थे स्वे कुटुम्बे अनुकम्पाम् यदि हि न विभृयात्, (तर्हि) विपत्ति-ज्वर-जनित-रुजा-अतीव-दुःख-आसिकानाम् वक्त्रम् वीक्षेत?
Summary
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When the Ganges, which kisses Shiva's head, can provide a good livelihood with bark from banyan trees and good fruits, what wise man would look at the faces of the wretched, afflicted by calamity, unless he had compassion for his own suffering family?
सारांश
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जब गंगा तट पर वृक्षों की छाल और फल उपलब्ध हैं, तब कोई भी विद्वान धनिकों के कष्टकारी व्यवहार को क्यों सहे? ऐसा वह तभी करता है जब उसे अपने परिवार के भरण-पोषण की चिंता हो।
पदच्छेदः
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| सत्याम् | सत् (√अस्+शतृ, ७.१) | while being present |
| एव | एव | indeed |
| त्रिलोकी-सरिति | त्रिलोकी–सरित् (७.१) | in the river of the three worlds (Ganges) |
| हर-शिरः-चुम्बिनी-अवच्छटायाम् | हर–शिरस्–चुम्बिनी–अवच्छटा (७.१) | which has the splendor of kissing Shiva's head |
| सत्-वृत्तिम् | सत्–वृत्ति (२.१) | a good livelihood |
| कल्पयन्त्याम् | कल्पयन्ती (√कॢप्+णिच्+शतृ, ७.१) | providing |
| बट-विटप-भवैः | बट–विटप–भव (३.३) | with those born from banyan tree branches |
| वल्कलैः | वल्कल (३.३) | with bark garments |
| सत्-फलैः | सत्–फल (३.३) | with good fruits |
| च | च | and |
| कः | किम् (१.१) | what |
| अयम् | इदम् (१.१) | this |
| विद्वान् | विद्वस् (√विद्+क्वसु, १.१) | learned man |
| विपत्ति-ज्वर-जनित-रुजा-अतीव-दुःख-आसिकानाम् | विपत्ति–ज्वर–जनित–रुज्–अतीव–दुःख–आसिका (६.३) | of those whose faces are extremely sad due to the pain caused by the fever of calamity |
| वक्त्रम् | वक्त्र (२.१) | face |
| वीक्षेत | वीक्षेत (वि√ईक्ष् कर्तरि विधिलिङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | would look at |
| दुःस्थे | दुःस्थ (७.१) | in a miserable state |
| यदि | यदि | if |
| हि | हि | indeed |
| न | न | not |
| विभृयात् | विभृयात् (√भृ कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | would bear/have |
| स्वे | स्व (७.१) | his own |
| कुटुम्बे | कुटुम्ब (७.१) | in the family |
| अनुकम्पाम् | अनुकम्पा (२.१) | compassion |
छन्दः
स्रग्धरा [२१: मरभनययय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ | २० | २१ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | त्या | मे | व | त्रि | लो | की | स | रि | ति | ह | र | शि | र | श्चु | म्बि | नी | व | च्छ | टा | यां |
| स | द्वृ | त्तिं | क | ल्प | य | न्त्यां | ब | ट | वि | ट | प | भ | वै | र्व | ल्क | लैः | स | त्फ | लै | श्च |
| को | ऽयं | वि | द्वा | न्वि | प | त्ति | ज्व | र | ज | नि | त | रु | जा | ती | व | दुः | खा | सि | का | नां |
| व | क्त्रं | वी | क्षे | त | दुः | स्थे | य | दि | हि | न | वि | भृ | या | त्स्वे | कु | टु | म्बे | ऽनु | क | म्पाम् |
| म | र | भ | न | य | य | य | ||||||||||||||
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