अभुक्तायां यस्यां क्षणमपि न यातं नृपशतै-
र्धुवस्तस्या लाभे क इव बहुमानः क्षितिभृताम् ।
तदंशस्याप्यंशे तदवयलेशेऽपि पतयो
विषादे कर्तव्ये विदधति जडाः प्रत्युत मुदम् ॥
अभुक्तायां यस्यां क्षणमपि न यातं नृपशतै-
र्धुवस्तस्या लाभे क इव बहुमानः क्षितिभृताम् ।
तदंशस्याप्यंशे तदवयलेशेऽपि पतयो
विषादे कर्तव्ये विदधति जडाः प्रत्युत मुदम् ॥
र्धुवस्तस्या लाभे क इव बहुमानः क्षितिभृताम् ।
तदंशस्याप्यंशे तदवयलेशेऽपि पतयो
विषादे कर्तव्ये विदधति जडाः प्रत्युत मुदम् ॥
अन्वयः
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यस्याम् अभुक्तायाम् नृप-शतैः क्षणम् अपि न यातम्, तस्याः लाभे क्षिति-भृताम् कः इव बहुमानः? तत्-अंशस्य अपि अंशे तत्-अवयव-लेशे अपि पतयः जडाः विषादे कर्तव्ये सति प्रत्युत मुदम् विदधति ।
Summary
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What great honor is there for kings in gaining this earth, which has surely never been left unenjoyed by hundreds of previous kings for even a moment? Yet fools, who are masters of just a fraction of a portion of a tiny part of it, feel joy instead of the grief they ought to feel.
सारांश
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सैकड़ों राजाओं ने इस पृथ्वी को भोगा है, यह कभी किसी के साथ नहीं गई। इसके एक छोटे से टुकड़े को पाकर गर्व करना मूर्खता है; बुद्धिमान व्यक्ति तो इसकी नश्वरता पर शोक करते हैं।
पदच्छेदः
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| अभुक्तायाम् | अभुक्त (√भुज्+क्त, ७.१) | unenjoyed |
| यस्याम् | यद् (७.१) | in which (earth) |
| क्षणम् | क्षणम् | a moment |
| अपि | अपि | even |
| न | न | not |
| यातम् | यात (√या+क्त, १.१) | has passed |
| नृप-शतैः | नृप–शत (३.३) | by hundreds of kings |
| ध्रुवम् | ध्रुवम् | surely |
| तस्याः | तद् (६.१) | of that |
| लाभे | लाभ (७.१) | in gaining |
| कः | किम् (१.१) | what |
| इव | इव | sort of |
| बहुमानः | बहुमान (१.१) | great respect |
| क्षिति-भृताम् | क्षितिभृत् (६.३) | for kings |
| तत्-अंशस्य | तद्–अंश (६.१) | of a part of that |
| अपि | अपि | even |
| अंशे | अंश (७.१) | in a part |
| तत्-अवयव-लेशे | तद्–अवयव–लेश (७.१) | in a tiny fraction of its portion |
| अपि | अपि | even |
| पतयः | पति (१.३) | masters |
| विषादे | विषाद (७.१) | grief |
| कर्तव्ये | कर्तव्य (√कृ+तव्य, ७.१) | when it should be done |
| विदधति | विदधति (वि√धा कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | feel |
| जडाः | जड (१.३) | fools |
| प्रत्युत | प्रत्युत | on the contrary |
| मुदम् | मुद् (२.१) | joy |
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | भु | क्ता | यां | य | स्यां | क्ष | ण | म | पि | न | या | तं | नृ | प | श | तै |
| र्धु | व | स्त | स्या | ला | भे | क | इ | व | ब | हु | मा | नः | क्षि | ति | भृ | ताम् |
| त | दं | श | स्या | प्यं | शे | त | द | व | य | ले | शे | ऽपि | प | त | यो | |
| वि | षा | दे | क | र्त | व्ये | वि | द | ध | ति | ज | डाः | प्र | त्यु | त | मु | दम् |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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