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वयमिह परितुष्टा वल्कलैस्त्वं दुकूलैः
सम इह परितोषो निर्विशेषो विशेषः ।
स तु भवतु दरिद्रो यस्य तृष्णा विशाला
मनसि च परितुष्टे कोऽर्थवान्को दरिद्रः ॥

अन्वयः AI वयम् इह वल्कलैः परितुष्टाः (स्मः), त्वम् दुकूलैः (परितुष्टः असि) । इह परितोषः समः, विशेषः निर्विशेषः । सः तु दरिद्रः भवतु यस्य तृष्णा विशाला (अस्ति) । मनसि परितुष्टे च कः अर्थवान्? कः दरिद्रः?
Summary AI We are content here with bark garments, and you with silk ones. In this, our contentment is the same; the difference is no difference at all. He is truly poor whose desire is vast. When the mind is content, who is rich and who is poor?
सारांश AI हम वल्कल वस्त्रों में संतुष्ट हैं और तुम रेशमी वस्त्रों में, पर संतोष दोनों का समान है। दरिद्र तो वही है जिसकी इच्छाएँ बड़ी हैं; जिसका मन संतुष्ट है उसके लिए अमीर-गरीब का कोई भेद नहीं है।
पदच्छेदः AI
वयम्अस्मद् (१.३) we
इहइह here
परितुष्टाःपरितुष्ट (परि√तुष्+क्त, १.३) are satisfied
वल्कलैःवल्कल (३.३) with bark garments
त्वम्युष्मद् (१.१) you
दुकूलैःदुकूल (३.३) with silk garments
समःसम (१.१) is the same
इहइह in this matter
परितोषःपरितोष (१.१) the satisfaction
निर्विशेषःनिर्विशेष (१.१) is non-different
विशेषःविशेष (१.१) the difference
सःतद् (१.१) he
तुतु however
भवतुभवतु (√भू कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) let him be
दरिद्रःदरिद्र (१.१) poor
यस्ययद् (६.१) whose
तृष्णातृष्णा (१.१) desire
विशालाविशाल (१.१) is vast
मनसिमनस् (७.१) the mind
and
परितुष्टेपरितुष्ट (परि√तुष्+क्त, ७.१) being satisfied
कःकिम् (१.१) who
अर्थवान्अर्थवत् (१.१) is rich
कःकिम् (१.१) who
दरिद्रःदरिद्र (१.१) is poor
छन्दः मालिनी [१५: ननमयय]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११ १२ १३ १४ १५
मि रि तु ष्टा ल्क लै स्त्वं दु कू लैः
रि तो षो नि र्वि शे षो वि शे षः
तु तु रि द्रो स्य तृ ष्णा वि शा ला
सि रि तु ष्टे को ऽर्थ वा न्को रि द्रः
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