आदित्यस्य गतागतैरहरहः संक्षीयते जीवितं
व्यापारैर्बहुकार्यभारगुरुभिः कालोऽपि न ज्ञायते ।
दृष्ट्वा जन्मजराविपत्तिमरणं त्रासश्च नोत्पद्यते
पीत्वा मोहमयीं प्रमादमदिरामुन्मत्तभूतं जगत् ॥
आदित्यस्य गतागतैरहरहः संक्षीयते जीवितं
व्यापारैर्बहुकार्यभारगुरुभिः कालोऽपि न ज्ञायते ।
दृष्ट्वा जन्मजराविपत्तिमरणं त्रासश्च नोत्पद्यते
पीत्वा मोहमयीं प्रमादमदिरामुन्मत्तभूतं जगत् ॥
व्यापारैर्बहुकार्यभारगुरुभिः कालोऽपि न ज्ञायते ।
दृष्ट्वा जन्मजराविपत्तिमरणं त्रासश्च नोत्पद्यते
पीत्वा मोहमयीं प्रमादमदिरामुन्मत्तभूतं जगत् ॥
अन्वयः
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आदित्यस्य गत-आगतैः जीवितम् अहरहः संक्षीयते । बहु-कार्य-भार-गुरुभिः व्यापारैः कालः अपि न ज्ञायते । जन्म-जरा-विपत्ति-मरणम् दृष्ट्वा त्रासः च न उत्पद्यते । मोह-मयीम् प्रमाद-मदिराम् पीत्वा जगत् उन्मत्त-भूतम् (अस्ति) ।
Summary
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Life diminishes day by day with the sun's rising and setting. The passage of time is not even noticed amidst activities heavy with many tasks. Seeing birth, old age, calamity, and death, no fear arises. The world has become intoxicated, having drunk the wine of delusion and negligence.
सारांश
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सूर्य के आने-जाने से आयु निरंतर घट रही है और अत्यधिक कार्यों के बोझ में समय का पता ही नहीं चलता। जन्म, बुढ़ापा और मृत्यु को प्रत्यक्ष देखकर भी यह संसार मोह रूपी मदिरा पीकर मदहोश पड़ा है।
पदच्छेदः
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| आदित्यस्य | आदित्य (६.१) | of the sun |
| गत-आगतैः | गत–आगत (३.३) | by the comings and goings |
| अहरहः | अहरहस् | day by day |
| संक्षीयते | संक्षीयते (सम्√क्षि भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is diminished |
| जीवितम् | जीवित (१.१) | life |
| व्यापारैः | व्यापार (३.३) | by activities |
| बहु-कार्य-भार-गुरुभिः | बहु–कार्य–भार–गुरु (३.३) | which are heavy with the burden of many tasks |
| कालः | काल (१.१) | time |
| अपि | अपि | even |
| न | न | not |
| ज्ञायते | ज्ञायते (√ज्ञा भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is perceived |
| दृष्ट्वा | दृष्ट्वा (√दृश्+क्त्वा) | having seen |
| जन्म-जरा-विपत्ति-मरणम् | जन्म–जरा–विपत्ति–मरण (२.१) | birth, old age, calamity, and death |
| त्रासः | त्रास (१.१) | fear |
| च | च | and |
| न | न | not |
| उत्पद्यते | उत्पद्यते (उद्√पद् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | arises |
| पीत्वा | पीत्वा (√पा+क्त्वा) | having drunk |
| मोह-मयीम् | मोह–मयी (२.१) | consisting of delusion |
| प्रमाद-मदिराम् | प्रमाद–मदिरा (२.१) | the wine of negligence |
| उन्मत्त-भूतम् | उन्मत्त (उद्√मद्+क्त)–भूत (१.१) | has become intoxicated |
| जगत् | जगत् (१.१) | the world |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | दि | त्य | स्य | ग | ता | ग | तै | र | ह | र | हः | सं | क्षी | य | ते | जी | वि | तं |
| व्या | पा | रै | र्ब | हु | का | र्य | भा | र | गु | रु | भिः | का | लो | ऽपि | न | ज्ञा | य | ते |
| दृ | ष्ट्वा | ज | न्म | ज | रा | वि | प | त्ति | म | र | णं | त्रा | स | श्च | नो | त्प | द्य | ते |
| पी | त्वा | मो | ह | म | यीं | प्र | मा | द | म | दि | रा | मु | न्म | त्त | भू | तं | ज | गत् |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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