ये वर्तन्ते धनपतिपुरः प्रार्थनादुःखभाजो
ये चाल्पत्वं दधति विषयाक्षेपपर्याप्तबुद्धेः ।
तेषामन्तःस्फुरितहसितं वासराणि स्मरेयं
ध्यानच्छेदे शिखरिकुहरग्रावशय्यानिषण्णः ॥

अन्वयः AI ये धन-पति-पुरः प्रार्थना-दुःख-भाजः वर्तन्ते, ये च विषयाक्षेप-पर्याप्त-बुद्धेः अल्पत्वम् दधति, तेषाम् अन्तः-स्फुरित-हसितम् वासराणि ध्यान-च्छेदे शिखरि-कुहर-ग्राव-शय्या-निषण्णः (अहम्) स्मरेयम् ।
Summary AI In the intervals of my meditation, while seated on a stone bed in a mountain cave, I shall remember with an inner smile the days of those who suffer the misery of begging before the rich, and also those who, with minds content in renunciation, possess so little.
सारांश AI जब मैं पर्वत की गुफा में ध्यान मग्न रहूँगा, तब मैं उन लोगों की मूर्खता पर मुस्कुराऊँगा जो धन के लिए दूसरों के सामने गिड़गिड़ाते हैं या विषयों में ही सुख ढूँढते हैं।
पदच्छेदः AI
येयद् (१.३) Those who
वर्तन्तेवर्तन्ते (√वृत् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) are
धन-पति-पुरःधनपतिपुरस् before the rich
प्रार्थना-दुःख-भाजःप्रार्थनादुःखभाज् (१.३) partakers in the misery of begging
येयद् (१.३) and those who
and
अल्पत्वम्अल्पत्व (२.१) littleness
दधतिदधति (√धा कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) possess
विषयाक्षेप-पर्याप्त-बुद्धेःविषयआक्षेपपर्याप्तबुद्धि (६.१) of an intellect content with casting aside worldly objects
तेषाम्तद् (६.३) of them
अन्तः-स्फुरित-हसितम्अन्तर्स्फुरितहसित (२.१) with an inner smile
वासराणिवासर (२.३) their days
स्मरेयम्स्मरेयम् (√स्मृ कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) उ.पु. एक.) I shall remember
ध्यान-च्छेदेध्यानछेद (७.१) in the intervals of meditation
शिखरि-कुहर-ग्राव-शय्या-निषण्णःशिखरिन्कुहरग्रावन्शय्यानिषण्ण (१.१) while seated on a stone bed in a mountain cave
छन्दः मन्दाक्रान्ता [१७: मभनततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११ १२ १३ १४ १५ १६ १७
ये र्त न्ते ति पु रः प्रा र्थ ना दुः भा जो
ये चा ल्प त्वं ति वि या क्षे र्या प्त बु द्धेः
ते षा न्तः स्फु रि सि तं वा रा णि स्म रे यं
ध्या च्छे दे शि रि कु ग्रा य्या नि ण्णः
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