किं कन्दाः कन्दरेभ्यः प्रलयमुपगता निर्झरा वा गिरिभ्यः
प्रध्वस्ता वा तरुभ्यः सरसगलभृतो वल्कलिन्यश्च शाखाः ।
वीक्ष्यन्ते यन्मुखानि प्रसभमपगतप्रश्रयाणां खलानां
दुःखाप्तस्वल्पवित्तस्मयपवनवशानर्तितभ्रूलतानि ॥
किं कन्दाः कन्दरेभ्यः प्रलयमुपगता निर्झरा वा गिरिभ्यः
प्रध्वस्ता वा तरुभ्यः सरसगलभृतो वल्कलिन्यश्च शाखाः ।
वीक्ष्यन्ते यन्मुखानि प्रसभमपगतप्रश्रयाणां खलानां
दुःखाप्तस्वल्पवित्तस्मयपवनवशानर्तितभ्रूलतानि ॥
प्रध्वस्ता वा तरुभ्यः सरसगलभृतो वल्कलिन्यश्च शाखाः ।
वीक्ष्यन्ते यन्मुखानि प्रसभमपगतप्रश्रयाणां खलानां
दुःखाप्तस्वल्पवित्तस्मयपवनवशानर्तितभ्रूलतानि ॥
अन्वयः
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किम् कन्दरेभ्यः कन्दाः प्रलयम् उपगताः? वा गिरिभ्यः निर्झराः प्रध्वस्ताः? वा तरुभ्यः सरस-गल-भृतः वल्कलिन्यः च शाखाः (प्रध्वस्ताः)? यत् प्रसभम् अपगत-प्रश्रयाणाम् खलानाम् दुःख-आप्त-स्वल्प-वित्त-स्मय-पवन-वश-अनर्तित-भ्रू-लतानि मुखानि वीक्ष्यन्ते ।
Summary
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Have the edible roots vanished from the caves? Have the streams from the mountains been destroyed? Or have the bark-yielding branches that provide soft garments disappeared from the trees? Why else must one look upon the faces of the wicked and insolent, whose creeper-like eyebrows dance in the wind of pride arising from their meager wealth acquired with difficulty?
सारांश
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क्या पर्वतों में कंद-मूल और झरने समाप्त हो गए हैं, जो लोग उन अहंकारी धनवानों की टेढ़ी भौंहों वाले मुख को सहते हैं जो थोड़े से धन के मद में अंधे हो चुके हैं?
पदच्छेदः
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| किम् | किम् | Have |
| कन्दाः | कन्द (१.३) | the edible roots |
| कन्दरेभ्यः | कन्दर (५.३) | from the caves |
| प्रलयम् | प्रलय (२.१) | to ruin |
| उपगताः | उपगत (उप√गम्+क्त, १.३) | gone |
| निर्झराः | निर्झर (१.३) | the streams |
| वा | वा | or |
| गिरिभ्यः | गिरि (५.३) | from the mountains |
| प्रध्वस्ताः | प्रध्वस्त (प्र√ध्वंस्+क्त, १.३) | been destroyed |
| वा | वा | or |
| तरुभ्यः | तरु (५.३) | from the trees |
| सरस-गल-भृतः | सरस–गल–भृत् (१.३) | providing soft garments |
| वल्कलिन्यः | वल्कलिन (१.३) | bark-yielding |
| च | च | and |
| शाखाः | शाखा (१.३) | branches (disappeared) |
| वीक्ष्यन्ते | वीक्ष्यन्ते (वि√ईक्ष् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | are looked upon |
| यत् | यत् | that |
| मुखानि | मुख (२.३) | the faces |
| प्रसभम् | प्रसभम् | insolently |
| अपगत-प्रश्रयाणाम् | अपगत–प्रश्रय (६.३) | of those devoid of humility |
| खलानाम् | खल (६.३) | of the wicked |
| दुःख-आप्त-स्वल्प-वित्त-स्मय-पवन-वश-अनर्तित-भ्रू-लतानि | दुःख–आप्त–स्वल्प–वित्त–स्मय–पवन–वश–अनर्तित–भ्रू–लता (२.३) | whose creeper-like eyebrows dance in the wind of pride from meager wealth acquired with difficulty |
छन्दः
स्रग्धरा [२१: मरभनययय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ | २० | २१ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| किं | क | न्दाः | क | न्द | रे | भ्यः | प्र | ल | य | मु | प | ग | ता | नि | र्झ | रा | वा | गि | रि | भ्यः |
| प्र | ध्व | स्ता | वा | त | रु | भ्यः | स | र | स | ग | ल | भृ | तो | व | ल्क | लि | न्य | श्च | शा | खाः |
| वी | क्ष्य | न्ते | य | न्मु | खा | नि | प्र | स | भ | म | प | ग | त | प्र | श्र | या | णां | ख | ला | नां |
| दुः | खा | प्त | स्व | ल्प | वि | त्त | स्म | य | प | व | न | व | शा | न | र्ति | त | भ्रू | ल | ता | नि |
| म | र | भ | न | य | य | य | ||||||||||||||
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