पुण्ये ग्रामे वने वा महति सितपटच्छन्नपाली कपालिं
ह्यादाय न्यायगर्भद्विजहुतहुतभुग्धूमधूम्रोपकण्ठे ।
द्वारं द्वारं प्रविष्टो वरमुदरदरीपूरणाय क्षुधार्तो
मानी प्राणैः सनाथो न पुनरनुदिनं तुल्यकुल्येसु दीनः ॥
पुण्ये ग्रामे वने वा महति सितपटच्छन्नपाली कपालिं
ह्यादाय न्यायगर्भद्विजहुतहुतभुग्धूमधूम्रोपकण्ठे ।
द्वारं द्वारं प्रविष्टो वरमुदरदरीपूरणाय क्षुधार्तो
मानी प्राणैः सनाथो न पुनरनुदिनं तुल्यकुल्येसु दीनः ॥
ह्यादाय न्यायगर्भद्विजहुतहुतभुग्धूमधूम्रोपकण्ठे ।
द्वारं द्वारं प्रविष्टो वरमुदरदरीपूरणाय क्षुधार्तो
मानी प्राणैः सनाथो न पुनरनुदिनं तुल्यकुल्येसु दीनः ॥
अन्वयः
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मानी क्षुधार्तः (सन्) न्याय-गर्भ-द्विज-हुत-हुत-भुक्-धूम-धूम्र-उपकण्ठे पुण्ये ग्रामे वा महति वने सित-पटत्-छन्न-पालीम् कपालिम् आदाय उदर-दरी-पूरणाय द्वारम् द्वारम् प्रविष्टः (सन्) प्राणैः सनाथः (भवति इति) वरम्, पुनः अनुदिनम् तुल्य-कुल्येषु दीनः न (भवति इति वरम्) ।
Summary
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It is better for a self-respecting man, afflicted by hunger, to enter door to door in a sacred village or a great forest—whose surroundings are gray with the smoke from fires kindled by righteous Brahmins—carrying a begging bowl with a clean cloth-covered rim to fill the cave of his stomach, and thus remain master of his life. It is not better to be wretched daily among his own equals.
सारांश
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अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए किसी पवित्र स्थान पर भिक्षा माँगकर पेट भरना श्रेष्ठ है, बजाय इसके कि व्यक्ति अपने ही कुल के लोगों के सामने प्रतिदिन दीन बनकर गिड़गिड़ाए।
पदच्छेदः
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| पुण्ये | पुण्य (७.१) | in a sacred |
| ग्रामे | ग्राम (७.१) | village |
| वने | वन (७.१) | in a forest |
| वा | वा | or |
| महति | महत् (७.१) | great |
| सित-पटत्-छन्न-पालीम् | सित–पटत्–छन्न–पाली (२.१) | with a rim covered by a clean cloth |
| कपालिम् | कपालिन् (२.१) | a begging bowl |
| हि | हि | indeed |
| आदाय | आदाय (आ√दा+ल्यप्) | having taken |
| न्याय-गर्भ-द्विज-हुत-हुत-भुक्-धूम-धूम्र-उपकण्ठे | न्याय–गर्भ–द्विज–हुत–हुतभुज्–धूम–धूम्र–उपकण्ठ (७.१) | in the vicinity gray with smoke from fires kindled by righteous Brahmins |
| द्वारम् | द्वार (२.१) | door |
| द्वारम् | द्वार (२.१) | to door |
| प्रविष्टः | प्रविष्ट (प्र√विश्+क्त, १.१) | having entered |
| वरम् | वरम् | it is better |
| उदर-दरी-पूरणाय | उदर–दरी–पूरण (४.१) | to fill the cave of the stomach |
| क्षुधार्तः | क्षुधा–आर्त (१.१) | afflicted by hunger |
| मानी | मानिन् (१.१) | a self-respecting man |
| प्राणैः | प्राण (३.३) | of his life |
| सनाथः | सनाथ (१.१) | be master |
| न | न | not |
| पुनः | पुनर् | but |
| अनुदिनम् | अनुदिनम् | daily |
| तुल्य-कुल्येषु | तुल्य–कुल्य (७.३) | among his equals |
| दीनः | दीन (१.१) | be wretched |
छन्दः
स्रग्धरा [२१: मरभनययय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ | २० | २१ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पु | ण्ये | ग्रा | मे | व | ने | वा | म | ह | ति | सि | त | प | ट | च्छ | न्न | पा | ली | क | पा | लिं |
| ह्या | दा | य | न्या | य | ग | र्भ | द्वि | ज | हु | त | हु | त | भु | ग्धू | म | धू | म्रो | प | क | ण्ठे |
| द्वा | रं | द्वा | रं | प्र | वि | ष्टो | व | र | मु | द | र | द | री | पू | र | णा | य | क्षु | धा | र्तो |
| मा | नी | प्रा | णैः | स | ना | थो | न | पु | न | र | नु | दि | नं | तु | ल्य | कु | ल्ये | सु | दी | नः |
| म | र | भ | न | य | य | य | ||||||||||||||
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