पान्थ स्त्रीविरहानलाहुतिकलामातन्वती मञ्जरी-
माकन्देषु पिकाङ्गनाभिरधुना सोत्कण्ठमालोक्यते ।
अप्येते नवपाटलापरिमलप्राग्भारपाटच्चरा
वान्तिक्लान्तिवितानतानवकृतः श्रीखण्डशैलानिलाः ॥
पान्थ स्त्रीविरहानलाहुतिकलामातन्वती मञ्जरी-
माकन्देषु पिकाङ्गनाभिरधुना सोत्कण्ठमालोक्यते ।
अप्येते नवपाटलापरिमलप्राग्भारपाटच्चरा
वान्तिक्लान्तिवितानतानवकृतः श्रीखण्डशैलानिलाः ॥
माकन्देषु पिकाङ्गनाभिरधुना सोत्कण्ठमालोक्यते ।
अप्येते नवपाटलापरिमलप्राग्भारपाटच्चरा
वान्तिक्लान्तिवितानतानवकृतः श्रीखण्डशैलानिलाः ॥
अन्वयः
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अधुना आकन्देषु पान्थ-स्त्री-विरह-अनल-आहुति-कलाम् आतन्वती मञ्जरीम् पिक-अङ्गनाभिः स-उत्कण्ठम् आलोक्यते । अपि च, नव-पाटला-परिमल-प्राक्-भार-पाटत्-चराः वान्ति-क्लान्ति-वितान-तानव-कृतः एते श्रीखण्ड-शैल-अनिलाः वान्ति ।
Summary
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Now, the female cuckoos longingly gaze at the mango blossoms, which act as an offering to the fire of separation for the travelers' wives. Moreover, these winds from the Sandalwood mountains, which steal the abundant fragrance of new trumpet flowers and reduce the expanse of weariness from their blowing, are also blowing.
सारांश
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परदेसी पतियों की पत्नियों के विरह को बढ़ाने वाली आम की मंजरी को कोयलें देख रही हैं। चमेली की सुगंध से युक्त मलय पर्वत की शीतल हवाएं थकावट दूर करने के लिए मंद-मंद बह रही हैं।
पदच्छेदः
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| पान्थ-स्त्री-विरह-अनल-आहुति-कलाम् | पान्थ–स्त्री–विरह–अनल–आहुति–कला (२.१) | the art of being an offering to the fire of separation of the travelers' wives |
| आतन्वती | आतन्वती (आ√तन्+शतृ, २.१) | spreading |
| मञ्जरीम् | मञ्जरी (२.१) | the blossom |
| आकन्देषु | आकन्द (७.३) | on the mango trees |
| पिक-अङ्गनाभिः | पिक–अङ्गना (३.३) | by the female cuckoos |
| अधुना | अधुना | now |
| स-उत्कण्ठम् | सोत्कण्ठम् | longingly |
| आलोक्यते | आलोक्यते (आ√लोक् +यक् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is being looked at |
| अपि | अपि | also |
| एते | एतद् (१.३) | these |
| नव-पाटला-परिमल-प्राक्-भार-पाटत्-चराः | नव–पाटला–परिमल–प्राग्भार–पाटच्चर (१.३) | thieves of the abundant fragrance of new trumpet flowers |
| वान्ति-क्लान्ति-वितान-तानव-कृतः | वान्ति–क्लान्ति–वितान–तानव–कृत् (१.३) | makers of the reduction of the expanse of weariness from blowing |
| श्रीखण्ड-शैल-अनिलाः | श्रीखण्डशैल–अनिल (१.३) | winds from the Sandalwood mountains |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पा | न्थ | स्त्री | वि | र | हा | न | ला | हु | ति | क | ला | मा | त | न्व | ती | म | ञ्ज | री |
| मा | क | न्दे | षु | पि | का | ङ्ग | ना | भि | र | धु | ना | सो | त्क | ण्ठ | मा | लो | क्य | ते |
| अ | प्ये | ते | न | व | पा | ट | ला | प | रि | म | ल | प्रा | ग्भा | र | पा | ट | च्च | रा |
| वा | न्ति | क्ला | न्ति | वि | ता | न | ता | न | व | कृ | तः | श्री | ख | ण्ड | शै | ला | नि | लाः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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