संसारे स्वप्नसारे परिणतितरले द्वे गती पण्डितानां
तत्त्वज्ञानामृताम्भःप्लवललितधियां यातु कालः कथञ्चित् ।
नो चेन्मुग्धाङ्गनानां स्तनजघनघनाभोगसम्भोगिनीनां
स्थूलोपस्थस्थलीषु स्थगितकरतलस्पर्शलीलोद्यमानाम् ॥
संसारे स्वप्नसारे परिणतितरले द्वे गती पण्डितानां
तत्त्वज्ञानामृताम्भःप्लवललितधियां यातु कालः कथञ्चित् ।
नो चेन्मुग्धाङ्गनानां स्तनजघनघनाभोगसम्भोगिनीनां
स्थूलोपस्थस्थलीषु स्थगितकरतलस्पर्शलीलोद्यमानाम् ॥
तत्त्वज्ञानामृताम्भःप्लवललितधियां यातु कालः कथञ्चित् ।
नो चेन्मुग्धाङ्गनानां स्तनजघनघनाभोगसम्भोगिनीनां
स्थूलोपस्थस्थलीषु स्थगितकरतलस्पर्शलीलोद्यमानाम् ॥
अन्वयः
AI
स्वप्न-सारे परिणति-तरले संसारे पण्डितानाम् द्वे गती (स्तः) । (एकम् तु) तत्त्व-ज्ञान-अमृत-अम्भः-प्लव-ललित-धियाम् कालः कथञ्चित् यातु । नो चेत्, मुग्ध-अङ्गनानाम् स्तन-जघन-घन-आभोग-सम्भोगिनीनाम् स्थूल-उपस्थ-स्थलीषु स्थगित-करतल-स्पर्श-लील-उद्यमानाम् (सङ्गेन कालो यातु) ।
Summary
AI
In this dream-like, transient world, there are two paths for the wise. Either their time should be spent with minds delighted by floating in the nectar-waters of philosophical knowledge. Or, it should be spent with charming women, enjoying the full expanse of their breasts and hips, and engaging in the playful act of touching their broad laps with concealing palms.
सारांश
AI
इस स्वप्नवत संसार में विद्वानों के लिए दो ही गतियाँ हैं—या तो वे तत्वज्ञान के अमृत में मग्न रहें, या सुंदर युवतियों के आलिंगन और सुख में लीन हों।
पदच्छेदः
AI
| संसारे | संसार (७.१) | In the world |
| स्वप्न-सारे | स्वप्न–सार (७.१) | dream-like |
| परिणति-तरले | परिणति–तरल (७.१) | transient |
| द्वे | द्वि (१.२) | two |
| गती | गति (१.२) | paths |
| पण्डितानाम् | पण्डित (६.३) | for the wise |
| तत्त्व-ज्ञान-अमृत-अम्भः-प्लव-ललित-धियाम् | तत्त्व–ज्ञान–अमृत–अम्भस्–प्लव–ललित–धी (६.३) | of those whose minds are delighted by floating in the nectar-waters of philosophical knowledge |
| यातु | यातु (√या कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | should pass |
| कालः | काल (१.१) | time |
| कथञ्चित् | कथञ्चित् | somehow |
| नो | नो | Or |
| चेत् | चेद् | if not |
| मुग्ध-अङ्गनानाम् | मुग्ध–अङ्गना (६.३) | of charming women |
| स्तन-जघन-घन-आभोग-सम्भोगिनीनाम् | स्तन–जघन–घन–आभोग–सम्भोगिनी (६.३) | enjoying the full expanse of their breasts and hips |
| स्थूल-उपस्थ-स्थलीषु | स्थूल–उपस्थ–स्थली (७.३) | on their broad laps |
| स्थगित-करतल-स्पर्श-लील-उद्यमानाम् | स्थगित–करतल–स्पर्श–लीला–उद्यम (६.३) | engaging in the playful act of touching with concealing palms |
छन्दः
स्रग्धरा [२१: मरभनययय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ | २० | २१ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सं | सा | रे | स्व | प्न | सा | रे | प | रि | ण | ति | त | र | ले | द्वे | ग | ती | प | ण्डि | ता | नां |
| त | त्त्व | ज्ञा | ना | मृ | ता | म्भः | प्ल | व | ल | लि | त | धि | यां | या | तु | का | लः | क | थ | ञ्चित् |
| नो | चे | न्मु | ग्धा | ङ्ग | ना | नां | स्त | न | ज | घ | न | घ | ना | भो | ग | स | म्भो | गि | नी | नां |
| स्थू | लो | प | स्थ | स्थ | ली | षु | स्थ | गि | त | क | र | त | ल | स्प | र्श | ली | लो | द्य | मा | नाम् |
| म | र | भ | न | य | य | य | ||||||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.