असाराः सर्वे ते विरतिविरसाः पापविषया
जुगुप्स्यन्तां यद्वा ननु सकलदोषास्पदमिति ।
तथाप्येतद्भूमौ नहि परहितात्पुण्यमधिकं
न चास्मिन्संसारे कुवलयदृशो रम्यमपरम् ॥
असाराः सर्वे ते विरतिविरसाः पापविषया
जुगुप्स्यन्तां यद्वा ननु सकलदोषास्पदमिति ।
तथाप्येतद्भूमौ नहि परहितात्पुण्यमधिकं
न चास्मिन्संसारे कुवलयदृशो रम्यमपरम् ॥
जुगुप्स्यन्तां यद्वा ननु सकलदोषास्पदमिति ।
तथाप्येतद्भूमौ नहि परहितात्पुण्यमधिकं
न चास्मिन्संसारे कुवलयदृशो रम्यमपरम् ॥
अन्वयः
AI
सर्वे ते पाप-विषयाः असाराः, विरति-विरसाः (सन्ति), यत् वा ननु सकल-दोष-आस्पदम् इति (मत्वा) जुगुप्स्यन्ताम् । तथापि एतत्-भूमौ पर-हितात् अधिकम् पुण्यम् न हि (अस्ति), च अस्मिन् संसारे कुवलय-दृशः अपरम् रम्यम् न (अस्ति) ।
Summary
AI
Let all those sinful sense-objects be despised as worthless, tasteless in renunciation, or as the abode of all faults. Nevertheless, on this earth, there is no greater merit than doing good to others, and in this world, there is nothing more beautiful than a woman with lotus-like eyes.
सारांश
AI
यद्यपि विषय-भोग त्यागने योग्य और दोषपूर्ण हैं, फिर भी इस पृथ्वी पर परोपकार से बड़ा कोई पुण्य नहीं और सुंदर स्त्रियों से अधिक कोई रमणीय वस्तु नहीं।
पदच्छेदः
AI
| असाराः | असार (१.३) | worthless |
| सर्वे | सर्व (१.३) | All |
| ते | तद् (१.३) | those |
| विरति-विरसाः | विरति–विरस (१.३) | tasteless in renunciation |
| पाप-विषयाः | पाप–विषय (१.३) | sinful sense-objects |
| जुगुप्स्यन्ताम् | जुगुप्स्यन्ताम् (√गुप् +सन् भावकर्मणोः लोट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | let them be despised |
| यत् | यद् | or |
| वा | वा | that |
| ननु | ननु | indeed |
| सकल-दोष-आस्पदम् | सकल–दोष–आस्पद (१.१) | the abode of all faults |
| इति | इति | as |
| तथापि | तथापि | Nevertheless |
| एतत्-भूमौ | एतत्–भूमि (७.१) | on this earth |
| न | न | not |
| हि | हि | indeed |
| पर-हितात् | पर–हित (५.१) | than doing good to others |
| पुण्यम् | पुण्य (१.१) | merit |
| अधिकम् | अधिक (१.१) | is greater |
| न | न | not |
| च | च | and |
| अस्मिन् | इदम् (७.१) | in this |
| संसारे | संसार (७.१) | world |
| कुवलय-दृशः | कुवलय-दृश् (५.१) | than a woman with lotus-like eyes |
| रम्यम् | रम्य (१.१) | more beautiful |
| अपरम् | अपर (१.१) | other thing |
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | सा | राः | स | र्वे | ते | वि | र | ति | वि | र | साः | पा | प | वि | ष | या |
| जु | गु | प्स्य | न्तां | य | द्वा | न | नु | स | क | ल | दो | षा | स्प | द | मि | ति |
| त | था | प्ये | त | द्भू | मौ | न | हि | प | र | हि | ता | त्पु | ण्य | म | धि | कं |
| न | चा | स्मि | न्सं | सा | रे | कु | व | ल | य | दृ | शो | र | म्य | म | प | रम् |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.