शृङ्गारद्रुमनीरदे प्रसृमरक्रीडारसस्रोतसि
प्रद्युम्नप्रियबान्धवे चतुरवाङ्मुक्ताफलोदन्वति ।
तन्वीनेत्रचकोरपावनविधौ सौभाग्यलक्ष्मीनिधौ
धन्यः कोऽपि न विक्रियां कलयति प्राप्ते नवे यौवने ॥
शृङ्गारद्रुमनीरदे प्रसृमरक्रीडारसस्रोतसि
प्रद्युम्नप्रियबान्धवे चतुरवाङ्मुक्ताफलोदन्वति ।
तन्वीनेत्रचकोरपावनविधौ सौभाग्यलक्ष्मीनिधौ
धन्यः कोऽपि न विक्रियां कलयति प्राप्ते नवे यौवने ॥
प्रद्युम्नप्रियबान्धवे चतुरवाङ्मुक्ताफलोदन्वति ।
तन्वीनेत्रचकोरपावनविधौ सौभाग्यलक्ष्मीनिधौ
धन्यः कोऽपि न विक्रियां कलयति प्राप्ते नवे यौवने ॥
अन्वयः
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शृङ्गार-द्रुम-नीरदे, प्रसृमर-क्रीडा-रस-स्रोतसि, प्रद्युम्न-प्रिय-बान्धवे, चतुर-वाक्-मुक्ता-फल-उदन्वति, तन्वी-नेत्र-चकोर-पावन-विधौ, सौभाग्य-लक्ष्मी-निधौ नवे यौवने प्राप्ते (सति), कः अपि धन्यः विक्रियाम् न कलयति?
Summary
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When fresh youth arrives—a cloud to the tree of love, a stream for playful sentiment, a friend to Cupid, an ocean for clever speech, a moon for women's eyes, and a treasure of beauty—what blessed man does not undergo a change?
सारांश
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शृंगार रूपी वृक्ष के लिए जलधर और चतुर वाणी के सागर रूपी इस नवीन यौवन के आने पर भी जो पुरुष विचलित नहीं होता, वह वास्तव में धन्य है।
पदच्छेदः
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| शृङ्गार-द्रुम-नीरदे | शृङ्गार–द्रुम–नीरद (७.१) | which is a cloud to the tree of love |
| प्रसृमर-क्रीडा-रस-स्रोतसि | प्रसृमर–क्रीडा–रस–स्रोतस् (७.१) | a stream for the flowing sentiment of play |
| प्रद्युम्न-प्रिय-बान्धवे | प्रद्युम्न–प्रिय–बान्धव (७.१) | a dear friend to Cupid |
| चतुर-वाक्-मुक्ता-फल-उदन्वति | चतुर–वाच्–मुक्ता–फल–उदन्वत् (७.१) | an ocean for the pearls of clever speech |
| तन्वी-नेत्र-चकोर-पावन-विधौ | तन्वी–नेत्र–चकोर–पावन–विधु (७.१) | a purifying moon for the Chakora-bird eyes of slender women |
| सौभाग्य-लक्ष्मी-निधौ | सौभाग्य–लक्ष्मी–निधि (७.१) | a treasure of fortune and beauty |
| धन्यः | धन्य (१.१) | blessed man |
| कः | किम् (१.१) | what |
| अपि | अपि | indeed |
| न | न | not |
| विक्रियाम् | विक्रिया (२.१) | a change |
| कलयति | कलयति (√कलय् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | undergoes |
| प्राप्ते | प्राप्त (प्र√आप्+क्त, ७.१) | when arrives |
| नवे | नव (७.१) | fresh |
| यौवने | यौवन (७.१) | youth |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| शृ | ङ्गा | र | द्रु | म | नी | र | दे | प्र | सृ | म | र | क्री | डा | र | स | स्रो | त | सि |
| प्र | द्यु | म्न | प्रि | य | बा | न्ध | वे | च | तु | र | वा | ङ्मु | क्ता | फ | लो | द | न्व | ति |
| त | न्वी | ने | त्र | च | को | र | पा | व | न | वि | धौ | सौ | भा | ग्य | ल | क्ष्मी | नि | धौ |
| ध | न्यः | को | ऽपि | न | वि | क्रि | यां | क | ल | य | ति | प्रा | प्ते | न | वे | यौ | व | ने |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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