अदर्शने दर्शनमात्रकामा
दृष्ट्वा परिष्वङ्गसुखैकलोला ।
आलिङ्गितायां पुनरायताक्ष्या-
माशास्महे विग्रहयोरभेदम् ॥
अदर्शने दर्शनमात्रकामा
दृष्ट्वा परिष्वङ्गसुखैकलोला ।
आलिङ्गितायां पुनरायताक्ष्या-
माशास्महे विग्रहयोरभेदम् ॥
दृष्ट्वा परिष्वङ्गसुखैकलोला ।
आलिङ्गितायां पुनरायताक्ष्या-
माशास्महे विग्रहयोरभेदम् ॥
अन्वयः
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(वयम्) अदर्शने दर्शन-मात्र-कामाः (स्मः), दृष्ट्वा (च) परिष्वङ्ग-सुख-एक-लोलाः (भवामः) । पुनः आयत-अक्ष्याम् आलिङ्गितायाम् (सत्याम्) विग्रहयोः अभेदम् आशास्महे ।
Summary
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When she is not seen, we desire only to see her. Having seen her, we are eager for the singular pleasure of an embrace. And when the wide-eyed one is embraced, we wish for the non-separation of our two bodies.
सारांश
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वियोग में दर्शन की इच्छा, मिलन पर आलिंगन की लालसा और आलिंगन होने पर दोनों शरीरों के एक हो जाने की तीव्र कामना ही प्रेम की चरम अवस्था है।
पदच्छेदः
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| अदर्शने | अदर्शन (७.१) | When not seen |
| दर्शन-मात्र-कामा | दर्शन–मात्र–काम (१.१) | desiring only to see her |
| दृष्ट्वा | दृष्ट्वा (√दृश्+क्त्वा) | having seen her |
| परिष्वङ्ग-सुख-एक-लोला | परिष्वङ्ग–सुख–एक–लोल (१.१) | eager for the singular pleasure of an embrace |
| आलिङ्गितायाम् | आलिङ्गिता (आ√लिङ्ग्+क्त, ७.१) | when embraced |
| पुनः | पुनर् | again |
| आयत-अक्ष्याम् | आयत–अक्षि (७.१) | the wide-eyed one |
| आशास्महे | आशास्महे (आ√शास् कर्तरि लट् (आत्मने.) उ.पु. बहु.) | we wish for |
| विग्रहयोः | विग्रह (६.२) | of the two bodies |
| अभेदम् | अभेद (२.१) | the non-separation |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | द | र्श | ने | द | र्श | न | मा | त्र | का | मा |
| दृ | ष्ट्वा | प | रि | ष्व | ङ्ग | सु | खै | क | लो | ला |
| आ | लि | ङ्गि | ता | यां | पु | न | रा | य | ता | क्ष्या |
| मा | शा | स्म | हे | वि | ग्र | ह | यो | र | भे | दम् |
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