या साधूंश्च खलान्करोति विदुषो मूर्खान्हितान्द्वेषिणः
प्रत्यक्षं कुरुते परीक्षममृतं हालाहलं तत्क्षणात् ।
तामाराधय सत्क्रियां भगवतीं भोक्तुं फलं वाञ्छितं
हे साधो व्यसनैर्गुणेषु विपुलेष्वास्थां वृथा मा कृथाः ॥
या साधूंश्च खलान्करोति विदुषो मूर्खान्हितान्द्वेषिणः
प्रत्यक्षं कुरुते परीक्षममृतं हालाहलं तत्क्षणात् ।
तामाराधय सत्क्रियां भगवतीं भोक्तुं फलं वाञ्छितं
हे साधो व्यसनैर्गुणेषु विपुलेष्वास्थां वृथा मा कृथाः ॥
प्रत्यक्षं कुरुते परीक्षममृतं हालाहलं तत्क्षणात् ।
तामाराधय सत्क्रियां भगवतीं भोक्तुं फलं वाञ्छितं
हे साधो व्यसनैर्गुणेषु विपुलेष्वास्थां वृथा मा कृथाः ॥
अन्वयः
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या (सत्-क्रिया) साधून् खलान् च करोति, विदुषः मूर्खान्, हितान् द्वेषिणः (करोति), परोक्षम् प्रत्यक्षम् कुरुते, अमृतम् तत्-क्षणात् हालाहलम् (कुरुते), हे साधो, वाञ्छितम् फलम् भोक्तुम् ताम् भगवतीम् सत्-क्रियाम् आराधय। विपुलेषु गुणेषु व्यसनैः वृथा आस्थाम् मा कृथाः।
Summary
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O good man, if you wish to enjoy the desired fruit, worship that divine 'Good Action' which can turn saints into villains, the learned into fools, friends into foes, the unseen into the seen, and nectar into deadly poison in an instant. Do not vainly place your faith in abundant virtues or addictions.
सारांश
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सत्कर्म दुष्ट को सज्जन, मूर्ख को विद्वान और विष को अमृत बना देता है। अतः गुणों के व्यर्थ प्रदर्शन के बजाय उत्तम फल के लिए सत्कर्मों की आराधना करें।
पदच्छेदः
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| या | यद् (१.१) | She who |
| साधून् | साधु (२.३) | saints |
| च | च | and |
| खलान् | खल (२.३) | into villains |
| करोति | करोति (√कृ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | makes |
| विदुषः | विद्वस् (२.३) | the learned |
| मूर्खान् | मूर्ख (२.३) | into fools |
| हितान् | हित (२.३) | friends |
| द्वेषिणः | द्वेषिन् (२.३) | into foes |
| प्रत्यक्षम् | प्रत्यक्ष (२.१) | the seen |
| कुरुते | कुरुते (√कृ कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | makes |
| परोक्षम् | परोक्ष (२.१) | the unseen |
| अमृतम् | अमृत (२.१) | nectar |
| हालाहलम् | हालाहल (२.१) | into deadly poison |
| तत् | तद् | that |
| क्षणात् | क्षण (५.१) | in an instant |
| ताम् | तद् (२.१) | her |
| आराधय | आराधय (आ√राध् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | worship |
| सत् | सत् | good |
| क्रियाम् | क्रिया (२.१) | action |
| भगवतीम् | भगवती (२.१) | the divine |
| भोक्तुम् | भोक्तुम् (√भुज्+तुमुन्) | to enjoy |
| फलम् | फल (२.१) | the fruit |
| वाञ्छितम् | वाञ्छित (√वाञ्छ्+क्त, २.१) | desired |
| हे | हे | O |
| साधो | साधु (८.१) | good man |
| व्यसनैः | व्यसन (३.३) | in addictions |
| गुणेषु | गुण (७.३) | in virtues |
| विपुलेषु | विपुल (७.३) | abundant |
| आस्थाम् | आस्था (२.१) | faith |
| वृथा | वृथा | vainly |
| मा | मा | do not |
| कृथाः | कृथाः (√कृ कर्तरि लुङ् (आत्मने.) म.पु. एक.) | place |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| या | सा | धूं | श्च | ख | ला | न्क | रो | ति | वि | दु | षो | मू | र्खा | न्हि | ता | न्द्वे | षि | णः |
| प्र | त्य | क्षं | कु | रु | ते | प | री | क्ष | म | मृ | तं | हा | ला | ह | लं | त | त्क्ष | णात् |
| ता | मा | रा | ध | य | स | त्क्रि | यां | भ | ग | व | तीं | भो | क्तुं | फ | लं | वा | ञ्छि | तं |
| हे | सा | धो | व्य | स | नै | र्गु | णे | षु | वि | पु | ले | ष्वा | स्थां | वृ | था | मा | कृ | थाः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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