अन्वयः
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तरुः छिन्नः अपि रोहति। चन्द्रः क्षीणः अपि पुनः उपचीयते। इति विमृशन्तः सन्तः दुःखेषु न सन्तप्यन्ते।
Summary
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A tree, even when cut, grows again. The moon, even when waned, waxes again. Reflecting thus, the virtuous are not distressed by sorrows.
सारांश
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कटा हुआ वृक्ष फिर हरा हो जाता है और क्षीण हुआ चंद्रमा पुनः बढ़ जाता है। यह सोचकर ज्ञानी जन विपत्ति के समय शोक नहीं करते।
पदच्छेदः
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| छिन्नः | छिन्न (√छिद्+क्त, १.१) | cut |
| अपि | अपि | even when |
| रोहति | रोहति (√रुह् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | grows |
| तरुः | तरु (१.१) | a tree |
| क्षीणः | क्षीण (√क्षि+क्त, १.१) | waned |
| अपि | अपि | even when |
| उपचीयते | उपचीयते (उप√चि भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | waxes |
| पुनः | पुनर् | again |
| चन्द्रः | चन्द्र (१.१) | the moon |
| इति | इति | thus |
| विमृशन्तः | विमृशत् (वि√मृश्+शतृ, १.३) | reflecting |
| सन्तः | सत् (१.३) | the virtuous |
| सन्तप्यन्ते | सन्तप्यन्ते (सम्√तप् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | are distressed |
| न | न | not |
| दुःखेषु | दुःख (७.३) | by sorrows |
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