रत्नैर्महार्हैस्तुतुषुर्न देवा
न भेजिरे भीमविषेण भीतिम् ।
सुधां विना न परयुर्विरामं
न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः ॥

अन्वयः AI देवाः महा-अर्हैः रत्नैः न तुतुषुः, भीम-विषेण भीतिम् न भेजिरे। सुधाम् विना विरामम् न प्रययुः। धीराः निश्चित-अर्थात् न विरमन्ति।
Summary AI The gods were not satisfied with priceless gems, nor did they feel fear from the terrible poison. They did not stop without obtaining the nectar. Similarly, the steadfast do not desist from their determined goal.
सारांश AI देवताओं ने न तो कीमती रत्नों से संतुष्टि पाई और न ही वे भयंकर विष से डरे; वे अमृत प्राप्त किए बिना नहीं रुके। इसी प्रकार, धैर्यवान व्यक्ति अपने निश्चित लक्ष्य को प्राप्त किए बिना बीच में नहीं रुकते।
पदच्छेदः AI
रत्नैःरत्न (३.३) with gems
महामहत् greatly
अर्हैःअर्ह (३.३) valuable
तुतुषुःतुतुषुः (√तुष् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) were satisfied
not
देवाःदेव (१.३) the gods
not
भेजिरेभेजिरे (√भज् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) felt
भीमभीम terrible
विषेणविष (३.१) by the poison
भीतिम्भीति (२.१) fear
सुधाम्सुधा (२.१) nectar
विनाविना without
not
प्रययुःप्रययुः (प्र√या कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) did they stop
विरामम्विराम (२.१) rest
not
निश्चितनिश्चित (निस्√चि+क्त) determined
अर्थात्अर्थ (५.१) from the goal
विरमन्तिविरमन्ति (वि√रम् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) desist
धीराःधीर (१.३) the steadfast
छन्दः उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
त्नै र्म हा र्है स्तु तु षु र्न दे वा
भे जि रे भी वि षे भी तिम्
सु धां वि ना यु र्वि रा मं
नि श्चि ता र्था द्वि न्ति धी राः
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