लभेत सिकतासु तैलमपि यत्नतः पीडय-
न्पिबेच्च मृगतृष्णिकासु सलिलं पिपासार्दितः ।
कदाचिदपि पर्यटन् शशविषाणमासादये-
न्नतु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत् ॥
लभेत सिकतासु तैलमपि यत्नतः पीडय-
न्पिबेच्च मृगतृष्णिकासु सलिलं पिपासार्दितः ।
कदाचिदपि पर्यटन् शशविषाणमासादये-
न्नतु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत् ॥
न्पिबेच्च मृगतृष्णिकासु सलिलं पिपासार्दितः ।
कदाचिदपि पर्यटन् शशविषाणमासादये-
न्नतु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत् ॥
अन्वयः
AI
(नरः) यत्नतः पीडयन् सिकतासु अपि तैलम् लभेत, पिपासा-अर्दितः (सन्) मृग-तृष्णिकासु सलिलम् च पिबेत्, कदाचित् अपि पर्यटन् शश-विषाणम् आसादयेत्, तु प्रतिनिविष्ट-मूर्ख-जन-चित्तम् न आराधयेत् ।
Summary
AI
By pressing with effort, one might even obtain oil from sand; tormented by thirst, one might drink water from a mirage; and while wandering, one might even find a hare's horn. But one can never please the mind of a stubborn fool.
सारांश
AI
प्रयास करने पर बालू से तेल मिल सकता है, प्यासा मृगतृष्णा से जल पी सकता है और खरगोश के सींग भी मिल सकते हैं, किंतु दुराग्रही मूर्ख के मन को समझाना सर्वथा असंभव है।
पदच्छेदः
AI
| लभेत | लभेत (√लभ् कर्तरि विधिलिङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | one might obtain |
| सिकतासु | सिकता (७.३) | from sands |
| तैलम् | तैल (२.१) | oil |
| अपि | अपि | even |
| यत्नतः | यत्नतः | with effort |
| पीडयन् | पीडयन् (√पीड्+शतृ, १.१) | pressing |
| पिबेत् | पिबेत् (√पा कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | one might drink |
| च | च | and |
| मृग-तृष्णिकासु | मृगतृष्णिका (७.३) | in mirages |
| सलिलम् | सलिल (२.१) | water |
| पिपासा | पिपासा | thirst |
| अर्दितः | अर्दित (√अर्द+क्त, १.१) | tormented by |
| कदाचित् | कदाचित् | sometime |
| अपि | अपि | even |
| पर्यटन् | पर्यटन् (परि√अट्+शतृ, १.१) | wandering |
| शश | शश | hare's |
| विषाणम् | विषाण (२.१) | horn |
| आसादयेत् | आसादयेत् (आ√सद् +णिच् कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | one might find |
| न | न | not |
| तु | तु | but |
| प्रतिनिविष्ट | प्रतिनिविष्ट (प्रति+नि√विश्+क्त) | stubborn |
| मूर्ख | मूर्ख | foolish |
| जन | जन | person's |
| चित्तम् | चित्त (२.१) | mind |
| आराधयेत् | आराधयेत् (आ√राध् +णिच् कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | one could please |
छन्दः
पृथ्वी [१७: जसजसयलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ल | भे | त | सि | क | ता | सु | तै | ल | म | पि | य | त्न | तः | पी | ड | य |
| न्पि | बे | च्च | मृ | ग | तृ | ष्णि | का | सु | स | लि | लं | पि | पा | सा | र्दि | तः |
| क | दा | चि | द | पि | प | र्य | ट | न्श | श | वि | षा | ण | मा | सा | द | ये |
| न्न | तु | प्र | ति | नि | वि | ष्ट | मू | र्ख | ज | न | चि | त्त | मा | रा | ध | येत् |
| ज | स | ज | स | य | ल | ग | ||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.