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यद्धात्रा निजभालपट्टलिखितं स्तोकं महद्वा धनं
तत्प्राप्नोति मरुस्थलेऽपि नितरां मेरौ ततो नाधिकम् ।
तद्धीरो भव वित्तवत्सु कृपणां वृत्तिं वृथा सा कृथाः
कूपे पश्य पयोनिधावपि घटो गृह्णाति तुल्यं जलम् ॥

अन्वयः AI धात्रा निज-भाल-पट्ट-लिखितम् यत् स्तोकम् वा महत् वा धनम् (अस्ति), तत् मरुस्थले अपि नितराम् प्राप्नोति, मेरौ (अपि) ततः अधिकम् न (प्राप्नोति) । तत् धीरः भव, वित्तवत्सु कृपणाम् वृत्तिम् वृथा मा कृथाः । पश्य, घटः कूपे पयोनिधौ अपि तुल्यम् जलम् गृह्णाति ।
Summary AI Whatever wealth, little or great, is written on one's forehead by the Creator, one will certainly obtain it even in a desert, and not more than that even on Mount Meru. Therefore, be patient; do not adopt a wretched attitude before the wealthy in vain. See, a pot takes the same amount of water from a well as it does from the ocean.
सारांश AI विधाता ने भाग्य में जितना धन लिख दिया है, वह मरुस्थल में भी मिलेगा और सुमेरु पर्वत पर भी उससे अधिक नहीं मिलेगा। अतः धीरज रखें और धनिकों के सामने गिड़गिड़ाएं नहीं; समुद्र हो या कुआं, घड़ा अपनी क्षमता के बराबर ही जल भर पाता है।
पदच्छेदः AI
यत्यद् (१.१) Whatever
धात्राधात्रृ (३.१) by the Creator
निज-भाल-पट्ट-लिखितंनिजभालपट्टलिखित (√लिख्+क्त, १.१) is written on one's own forehead
स्तोकंस्तोक (१.१) little
महद्महत् (१.१) or great
वावा or
धनंधन (१.१) wealth
तत्तद् (२.१) that
प्राप्नोतिप्राप्नोति (प्र√आप् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) one obtains
मरुस्थलेमरुस्थल (७.१) in a desert
अपिअपि even
नितरांनितराम् certainly
मेरौमेरु (७.१) on Mount Meru
ततःततः than that
not
अधिकम्अधिक (२.१) more
तत्तत् Therefore
धीरःधीर (१.१) patient
भवभव (√भू कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) be
वित्तवत्सुवित्तवत् (७.३) before the wealthy
कृपणांकृपण (२.१) a wretched
वृत्तिंवृत्ति (२.१) attitude
वृथावृथा in vain
मामा do not
कृथाःकृथाः (√कृ कर्तरि लुङ् (परस्मै.) म.पु. एक.) adopt
कूपेकूप (७.१) in a well
पश्यपश्य (√दृश् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) see
पयोनिधौपयोनिधि (७.१) or in the ocean
अपिअपि even
घटःघट (१.१) a pot
गृह्णातिगृह्णाति (√ग्रह् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) takes
तुल्यंतुल्य (२.१) the same amount of
जलम्जल (२.१) water
छन्दः शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११ १२ १३ १४ १५ १६ १७ १८ १९
द्धा त्रा नि भा ट्ट लि खि तं स्तो कं द्वा नं
त्प्रा प्नो ति रु स्थ ले ऽपि नि रां मे रौ तो ना धि कम्
द्धी रो वि त्त त्सु कृ णां वृ त्तिं वृ था सा कृ थाः
कू पे श्य यो नि धा पि टो गृ ह्णा ति तु ल्यं लम्
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