दौर्मन्त्र्यान्नृपतिर्विनश्यति यतिः सङ्गात्सुतो लालना-
त्विप्रोऽनध्ययनात्कुलं कुतनयाच्छीलं खलोपासनात् ।
ह्रीर्मद्यादनवेक्षणादपि कृषिः स्नेहः प्रवासाश्रया-
न्मैत्री चाप्रणयात्समृद्धिरनयात्त्यागप्रमादाद्धनम् ॥

अन्वयः AI नृपतिः दौर्मन्त्र्यात् विनश्यति, यतिः सङ्गात्, सुतः लालनात्, विप्रः अनध्ययनात्, कुलम् कुतनयात्, शीलम् खल-उपासनात्, ह्रीः मद्यात्, कृषिः अपि अनवेक्षणात्, स्नेहः प्रवास-आश्रयात्, मैत्री च अप्रणयात्, समृद्धिः अनयात्, धनम् त्याग-प्रमादात् (विनश्यति) ।
Summary AI A king is ruined by bad counsel, an ascetic by attachment, a son by pampering, a Brahmin by not studying, a family by a wicked son, and character by serving the wicked. Modesty is lost through alcohol, agriculture through neglect, affection by living abroad, friendship by lack of love, prosperity by injustice, and wealth by extravagance and lack of charity.
सारांश AI बुरी सलाह से राजा, आसक्ति से संन्यासी, लाड़-प्यार से पुत्र, अध्ययन न करने से ब्राह्मण, कुपुत्र से कुल, दुष्टों की संगति से चरित्र, मद्यपान से लज्जा, देख-रेख न होने से खेती, प्रवास से प्रेम, प्रेम की कमी से मित्रता, कुनीति से ऐश्वर्य और प्रमाद से धन नष्ट हो जाता है।
पदच्छेदः AI
दौर्मन्त्र्यात्दौर्मन्त्र्य (५.१) From bad counsel
नृपतिःनृपति (१.१) a king
विनश्यतिविनश्यति (वि√नश् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) is ruined
यतिःयति (१.१) an ascetic
सङ्गात्सङ्ग (५.१) from attachment
सुतःसुत (१.१) a son
लालनात्लालन (५.१) from pampering
विप्रःविप्र (१.१) a Brahmin
अनध्ययनात्अध्ययन (५.१) from not studying
कुलंकुल (१.१) a family
कुतनयात्कुतनय (५.१) from a bad son
शीलंशील (१.१) character
खलोपासनात्खलउपासन (५.१) from serving the wicked
ह्रीःह्री (१.१) modesty
मद्यात्मद्य (५.१) from alcohol
अनवेक्षणात्अवेक्षण (५.१) from lack of supervision
अपिअपि and
कृषिःकृषि (१.१) agriculture
स्नेहःस्नेह (१.१) affection
प्रवासाश्रयात्प्रवासआश्रय (५.१) from residing abroad
मैत्रीमैत्री (१.१) friendship
and
अप्रणयात्प्रणय (५.१) from lack of affection
समृद्धिःसमृद्धि (१.१) prosperity
अनयात्नय (५.१) from injustice
त्याग-प्रमादात्त्यागप्रमाद (५.१) from negligence in charity and extravagance
धनम्धन (१.१) wealth
छन्दः शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११ १२ १३ १४ १५ १६ १७ १८ १९
दौ र्म न्त्र्या न्नृ ति र्वि श्य ति तिः ङ्गा त्सु तो ला ना
त्वि प्रो ऽन ध्य ना त्कु लं कु या च्छी लं लो पा नात्
ह्री र्म द्या वे क्ष णा पि कृ षिः स्ने हः प्र वा सा श्र या
न्मै त्री चा प्र या त्स मृ द्धि या त्त्या प्र मा दा द्ध नम्
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