अन्वयः
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मनस्विनः कुसुम-स्तवकस्य इव द्वयी वृत्तिः (भवति) । (सः) वा सर्व-लोकस्य मूर्ध्नि (तिष्ठति), वा वने एव शीर्यते ।
Summary
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A person of high self-respect has a two-fold existence, just like a bunch of flowers. Either they are placed on the heads of all people (held in the highest esteem), or they wither away in the forest (remain in obscurity).
सारांश
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स्वाभिमानी पुरुष की स्थिति फूलों के गुच्छे की तरह दो ही प्रकार की होती है—या तो वह समाज के मस्तक पर सुशोभित होता है या फिर वन में ही रहकर गुमनाम समाप्त हो जाता है।
पदच्छेदः
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| कुसुम-स्तवकस्येव | कुसुम–स्तवक (६.१)–इव | like a bunch of flowers |
| द्वयी | द्वय (१.१) | two-fold |
| वृत्तिर्मनस्विनः | वृत्ति (१.१)–मनस्विन् (६.१) | state of a high-minded person |
| मूर्ध्नि | मूर्धन् (७.१) | on the head |
| वा | वा | either |
| सर्व-लोकस्य | सर्व–लोक (६.१) | of all people |
| शीर्यते | शीर्यते (√शॄ भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | it withers |
| वन | वन (७.१) | in the forest |
| एव | एव | itself |
| वा | वा | or |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कु | सु | म | स्त | व | क | स्ये | व |
| द्व | यी | वृ | त्ति | र्म | न | स्वि | नः |
| मू | र्ध्नि | वा | स | र्व | लो | क | स्य |
| शी | र्य | ते | व | न | ए | व | वा |
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