Loading data... On slow networks this could take a few minutes.
100%

दाक्षिण्यं स्वजने दया परिजने शाठ्यं सदा दुर्जने
प्रीतिः साधुजने नयो नृपजने विद्वज्जने चार्जवम् ।
शौर्यं शत्रुजने क्षमा गुरुजने कान्ताजने धृष्टता
ये चैवं पुरुषाः कलासु कुशलास्तेष्वेव लोकस्थितिः ॥

अन्वयः AI ये पुरुषाः स्व-जने दाक्षिण्यम्, परि-जने दया, दुर्जने सदा शाठ्यम्, साधु-जने प्रीतिः, नृप-जने नयः, विद्वत्-जने च आर्जवम्, शत्रु-जने शौर्यम्, गुरु-जने क्षमा, कान्ता-जने धृष्टता (प्रदर्शयन्ति), एवम् (एतासु) कलासु कुशलाः (सन्ति), तेषु एव लोक-स्थितिः (अस्ति) ।
Summary AI Courtesy towards one's own people, compassion for dependents, cunning towards the wicked, affection for the good, diplomacy with rulers, straightforwardness with the learned, valor against enemies, forgiveness for elders, and boldness with one's beloved—those men who are skilled in these arts are the ones on whom the stability of the world rests.
सारांश AI अपनों के प्रति उदारता, सेवकों पर दया, दुष्टों के साथ चतुराई, सज्जनों से प्रेम, राजाओं के साथ नीति, विद्वानों के प्रति सरलता, शत्रुओं के सामने वीरता, गुरुजनों के प्रति सहनशीलता और स्त्रियों के साथ धृष्टता—जो पुरुष इन कलाओं में कुशल हैं, उन्हीं पर यह संसार टिका है।
पदच्छेदः AI
दाक्षिण्यम्दाक्षिण्य (१.१) Courtesy
स्व-जनेस्वजन (७.१) towards one's own people
दयादया (१.१) compassion
परि-जनेपरिजन (७.१) towards dependents
शाठ्यम्शाठ्य (१.१) cunning
सदासदा always
दुर्जनेदुर्जन (७.१) towards the wicked
प्रीतिःप्रीति (१.१) affection
साधु-जनेसाधुजन (७.१) towards good people
नयःनय (१.१) diplomacy
नृप-जनेनृपजन (७.१) towards kings
विद्वत्-जनेविद्वज्जन (७.१) towards the learned
and
आर्जवम्आर्जव (१.१) straightforwardness
शौर्यम्शौर्य (१.१) valor
शत्रु-जनेशत्रुजन (७.१) towards enemies
क्षमाक्षमा (१.१) forgiveness
गुरु-जनेगुरुजन (७.१) towards elders
कान्ता-जनेकान्ताजन (७.१) towards one's beloved
धृष्टताधृष्टता (१.१) boldness
येयद् (१.३) Those who
and
एवम्एवम् thus
पुरुषाःपुरुष (१.३) persons
कलासुकला (७.३) in these arts
कुशलाःकुशल (१.३) are skilled
तेषुतद् (७.३) on them
एवएव alone
लोक-स्थितिःलोकस्थिति (१.१) the stability of the world (rests)
छन्दः शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११ १२ १३ १४ १५ १६ १७ १८ १९
दा क्षि ण्यं स्व ने या रि ने शा ठ्यं दा दु र्ज ने
प्री तिः सा धु ने यो नृ ने वि द्व ज्ज ने चा र्ज वम्
शौ र्यं त्रु ने क्ष मा गु रु ने का न्ता ने धृ ष्ट ता
ये चै वं पु रु षाः ला सु कु ला स्ते ष्वे लो स्थि तिः
About

Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.