हर्तुर्याति न गोचरं किमपि शं पुष्णाति यत्सर्वदा-
ऽप्यर्थिभ्यः प्रतिपाद्यमानमनिशं प्राप्नोति वृद्धिं पराम् ।
कल्पान्तेष्वपि न प्रयाति निधनं विद्याख्यमन्तर्धनं
येषां तान्प्रति मानमुज्झत नृपाः कस्तैः सह स्पर्धते ॥
हर्तुर्याति न गोचरं किमपि शं पुष्णाति यत्सर्वदा-
ऽप्यर्थिभ्यः प्रतिपाद्यमानमनिशं प्राप्नोति वृद्धिं पराम् ।
कल्पान्तेष्वपि न प्रयाति निधनं विद्याख्यमन्तर्धनं
येषां तान्प्रति मानमुज्झत नृपाः कस्तैः सह स्पर्धते ॥
ऽप्यर्थिभ्यः प्रतिपाद्यमानमनिशं प्राप्नोति वृद्धिं पराम् ।
कल्पान्तेष्वपि न प्रयाति निधनं विद्याख्यमन्तर्धनं
येषां तान्प्रति मानमुज्झत नृपाः कस्तैः सह स्पर्धते ॥
अन्वयः
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(हे) नृपाः! येषाम् विद्या-आख्यम् अन्तः-धनम् (अस्ति), यत् हर्तुः गोचरम् न याति, सर्वदा किम् अपि शम् पुष्णाति, अर्थिभ्यः अनिशम् प्रतिपाद्यमानम् अपि पराम् वृद्धिम् प्राप्नोति, कल्प-अन्तेषु अपि निधनम् न प्रयाति, तान् प्रति मानम् उज्झत । कः तैः सह स्पर्धते?
Summary
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O kings, give up your pride before those who possess the inner wealth called knowledge! This wealth cannot be stolen, always brings happiness, grows immensely even when constantly given away, and is never destroyed even at the end of eons. Who can compete with them?
सारांश
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विद्या एक ऐसा गुप्त धन है जिसे कोई चुरा नहीं सकता, जो निरंतर बढ़ता है और कभी नष्ट नहीं होता। ऐसे धन के स्वामियों से राजाओं को स्पर्धा नहीं करनी चाहिए।
पदच्छेदः
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| हर्तुः | हर्तृ (६.१) | of a thief |
| याति | याति (√या कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | goes |
| न | न | not |
| गोचरम् | गोचर (२.१) | within the range |
| किम् | किम् | some |
| अपि | अपि | indescribable |
| शम् | शम् (२.१) | happiness |
| पुष्णाति | पुष्णाति (√पुष् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | nourishes |
| यत् | यद् (१.१) | which |
| सर्वदा | सर्वदा | always |
| अपि | अपि | also |
| अर्थिभ्यः | अर्थिन् (४.३) | to those who ask |
| प्रतिपाद्यमानम् | प्रतिपाद्यमान (प्रति√पद्+णिच्+शानच्, १.१) | being given |
| अनिशम् | अनिशम् | constantly |
| प्राप्नोति | प्राप्नोति (प्र√आप् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | attains |
| वृद्धिम् | वृद्धि (२.१) | growth |
| पराम् | परा (२.१) | supreme |
| कल्प-अन्तेषु | कल्पान्त (७.३) | at the end of eons |
| अपि | अपि | even |
| न | न | not |
| प्रयाति | प्रयाति (प्र√या कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | goes to |
| निधनम् | निधन (२.१) | destruction |
| विद्या-आख्यम् | विद्याख्य (१.१) | called knowledge |
| अन्तः-धनम् | अन्तर्धन (१.१) | the inner wealth |
| येषाम् | यद् (६.३) | of whom |
| तान् | तद् (२.३) | them |
| प्रति | प्रति | towards |
| मानम् | मान (२.१) | pride |
| उज्झत | उज्झत (√उझ्झ् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. बहु.) | give up |
| नृपाः | नृप (८.३) | O kings |
| कः | किम् (१.१) | who |
| तैः | तद् (३.३) | with them |
| सह | सह | with |
| स्पर्धते | स्पर्धते (√स्पर्ध् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | competes |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ह | र्तु | र्या | ति | न | गो | च | रं | कि | म | पि | शं | पु | ष्णा | ति | य | त्स | र्व | दा |
| ऽप्य | र्थि | भ्यः | प्र | ति | पा | द्य | मा | न | म | नि | शं | प्रा | प्नो | ति | वृ | द्धिं | प | राम् |
| क | ल्पा | न्ते | ष्व | पि | न | प्र | या | ति | नि | ध | नं | वि | द्या | ख्य | म | न्त | र्ध | नं |
| ये | षां | ता | न्प्र | ति | मा | न | मु | ज्झ | त | नृ | पाः | क | स्तैः | स | ह | स्प | र्ध | ते |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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