कान्ताकटाक्षविशिखा न लुनन्ति यस्य
चित्तं न निर्दहति किपकृशानुतापः ।
कर्षन्ति भूरिविषयाश्च न लोभपाशै-
र्लोकत्रयं जयति कृत्स्नमिदं स धीरः ॥

अन्वयः AI यस्य चित्तम् कान्ता-कटाक्ष-विशिखाः न लुनन्ति, कोप-कृशानु-तापः न निर्दहति, भूरि-विषयाः च लोभ-पाशैः न कर्षन्ति, सः धीरः इदम् कृत्स्नम् लोक-त्रयम् जयति ।
Summary AI That steadfast person, whose mind is not pierced by the arrow-like glances of a beloved, not burned by the fire of anger, and not dragged by the snares of greed for numerous worldly objects, conquers this entire triple world.
सारांश AI जिस व्यक्ति का मन स्त्रियों के कटाक्ष रूपी बाणों से बिंधता नहीं, जिसे क्रोध की अग्नि जलाती नहीं और जिसे विषयों का लोभ अपनी ओर नहीं खींचता, वही धैर्यवान पुरुष तीनों लोकों को जीतता है।
पदच्छेदः AI
कान्ता-कटाक्ष-विशिखाःकान्ताकटाक्षविशिख (१.३) The arrow-like side-glances of a beloved
do not
लुनन्तिलुनन्ति (√लू कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) cut
यस्ययद् (६.१) whose
चित्तम्चित्त (२.१) mind
not
निर्दहतिनिर्दहति (निर्√दह् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) does burn
कोप-कृशानु-तापःकोपकृशानुताप (१.१) the heat of the fire of anger
कर्षन्तिकर्षन्ति (√कृष् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) drag
भूरि-विषयाःभूरिविषय (१.३) numerous worldly objects
and
not
लोभ-पाशैःलोभपाश (३.३) with the snares of greed
लोक-त्रयम्लोकत्रय (२.१) the triple world
जयतिजयति (√जि कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) conquers
कृत्स्नम्कृत्स्न (२.१) entire
इदम्इदम् (२.१) this
सःतद् (१.१) he
धीरःधीर (१.१) the steadfast person
छन्दः वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११ १२ १३ १४
का न्ता टा क्ष वि शि खा लु न्ति स्य
चि त्तं नि र्द ति कि कृ शा नु ता पः
र्ष न्ति भू रि वि या श्च लो पा शै
र्लो त्र यं ति कृ त्स्न मि दं धी रः
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