अनेन कस्य अपि कुलाङ्कुरेण
स्पृष्टस्य गात्रेषु सुखं ममैवम् ।
कां निर्वृतिं चेतसि तस्य कुर्या-
द्यस्यायमङ्कात्कृतिनः प्ररूढः ॥
अनेन कस्य अपि कुलाङ्कुरेण
स्पृष्टस्य गात्रेषु सुखं ममैवम् ।
कां निर्वृतिं चेतसि तस्य कुर्या-
द्यस्यायमङ्कात्कृतिनः प्ररूढः ॥
स्पृष्टस्य गात्रेषु सुखं ममैवम् ।
कां निर्वृतिं चेतसि तस्य कुर्या-
द्यस्यायमङ्कात्कृतिनः प्ररूढः ॥
अन्वयः
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अनेन कस्य अपि कुल-अङ्कुरेण स्पृष्टस्य मम गात्रेषु एवम् सुखम् (अस्ति) । अयम् यस्य कृतिनः अङ्कात् प्ररूढः, तस्य चेतसि काम् निर्वृतिम् कुर्यात्?
Summary
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If I, who have merely been touched by this sprout of some family, feel such happiness in my limbs, what delight must he cause in the heart of that fortunate one from whose lap he has sprung?
पदच्छेदः
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| अनेन | इदम् (३.१) | by this |
| कस्य | किम् (६.१) | of some |
| अपि | अपि | indeed |
| कुल | कुल | undefined |
| अङ्कुरेण | अङ्कुर (३.१) | by the sprout of a family |
| स्पृष्टस्य | स्पृष्ट (√स्पृश्+क्त, ६.१) | of me, who has been touched |
| गात्रेषु | गात्र (७.३) | in the limbs |
| सुखम् | सुख (१.१) | happiness |
| मम | अस्मद् (६.१) | my |
| एवम् | एवम् | such |
| काम् | किम् (२.१) | what |
| निर्वृतिम् | निर्वृति (२.१) | delight |
| चेतसि | चेतस् (७.१) | in the heart |
| तस्य | तद् (६.१) | of him |
| कुर्यात् | कुर्यात् (√कृ कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | would he cause |
| यस्य | यद् (६.१) | whose |
| अयम् | इदम् (१.१) | this one |
| अङ्कात् | अङ्क (५.१) | from the lap |
| कृतिनः | कृतिन् (६.१) | of the fortunate one |
| प्ररूढः | प्ररूढ (प्र√रुह्+क्त, १.१) | has sprung |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | ने | न | क | स्य | अ | पि | कु | ला | ङ्कु | रे | ण |
| स्पृ | ष्ट | स्य | गा | त्रे | षु | सु | खं | म | मै | वम् | |
| कां | नि | र्वृ | तिं | चे | त | सि | त | स्य | कु | र्या | |
| द्य | स्या | य | म | ङ्का | त्कृ | ति | नः | प्र | रू | ढः | |
| त | त | ज | ग | ग | |||||||
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