प्रत्यादिष्टविशेषमण्डनविधिर्वामप्रकोष्ठार्पितम्
बिभ्रत्काञ्चनमेकमेव वलयं श्वासोपरक्ताधरः ।
चिन्ताजागरणप्रतान्तनयनस्तेजोगुणादात्मनः
संस्कारोल्लिखितो महामणिरिव क्षीणोऽपि नालक्ष्यते ॥
प्रत्यादिष्टविशेषमण्डनविधिर्वामप्रकोष्ठार्पितम्
बिभ्रत्काञ्चनमेकमेव वलयं श्वासोपरक्ताधरः ।
चिन्ताजागरणप्रतान्तनयनस्तेजोगुणादात्मनः
संस्कारोल्लिखितो महामणिरिव क्षीणोऽपि नालक्ष्यते ॥
बिभ्रत्काञ्चनमेकमेव वलयं श्वासोपरक्ताधरः ।
चिन्ताजागरणप्रतान्तनयनस्तेजोगुणादात्मनः
संस्कारोल्लिखितो महामणिरिव क्षीणोऽपि नालक्ष्यते ॥
अन्वयः
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प्रत्यादिष्टविशेषमण्डनविधिः, वामप्रकोष्ठार्पितम् एकम् एव काञ्चनम् वलयम् बिभ्रत्, श्वासोपरक्ताधरः, चिन्ताजागरणप्रतान्तनयनः (सः राजा) आत्मनः तेजोगुणात् संस्कारोल्लिखितः महामणिः इव क्षीणः अपि न आलक्ष्यते ।
Summary
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He has rejected special adornments, wearing only a single gold bracelet on his left forearm. His lips are reddened by sighs, his eyes languid from worry and sleeplessness. Yet, due to his innate brilliance, like a great gem brightened by polishing, though he is emaciated, it is not apparent.
पदच्छेदः
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| प्रत्यादिष्टविशेषमण्डनविधिः | प्रत्यादिष्ट (प्रति+आ√दिश्+क्त)–विशेष–मण्डन–विधि (१.१) | he who has rejected the practice of special adornment |
| वामप्रकोष्ठार्पितम् | वाम–प्रकोष्ठ–अर्पित (√ऋ+णिच्+क्त, २.१) | placed on the left forearm |
| बिभ्रत् | बिभ्रत् (√भृ+शतृ, १.१) | wearing |
| काञ्चनम् | काञ्चन (२.१) | golden |
| एकम् | एक (२.१) | single |
| एव | एव | only |
| वलयम् | वलय (२.१) | bracelet |
| श्वासोपरक्ताधरः | श्वास–उपरक्त (उप√रञ्ज्+क्त)–अधर (१.१) | whose lip is reddened by sighs |
| चिन्ताजागरणप्रतान्तनयनः | चिन्ता–जागरण–प्रतान्त (प्र√तन्+क्त)–नयन (१.१) | whose eyes are languid from worry and wakefulness |
| तेजोगुणात् | तेजस्–गुण (५.१) | from the quality of brilliance |
| आत्मनः | आत्मन् (६.१) | his own |
| संस्कारोल्लिखितः | संस्कार–उल्लिखित (उद्√लिख्+क्त, १.१) | brightened by polishing |
| महामणिः | महामणि (१.१) | a great gem |
| इव | इव | like |
| क्षीणः | क्षीण (√क्षि+क्त, १.१) | wasted away |
| अपि | अपि | although |
| न | न | not |
| आलक्ष्यते | आलक्ष्यते (आ√लक्ष् +णिच् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | he is perceived |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | त्या | दि | ष्ट | वि | शे | ष | म | ण्ड | न | वि | धि | र्वा | म | प्र | को | ष्ठा | र्पि | त |
| म्बि | भ्र | त्का | ञ्च | न | मे | क | मे | व | व | ल | यं | श्वा | सो | प | र | क्ता | ध | रः |
| चि | न्ता | जा | ग | र | ण | प्र | ता | न्त | न | य | न | स्ते | जो | गु | णा | दा | त्म | नः |
| सं | स्का | रो | ल्लि | खि | तो | म | हा | म | णि | रि | व | क्षी | णो | ऽपि | ना | ल | क्ष्य | ते |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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