रम्यं द्वेष्टि यथा पुरा प्रकृतिभिर्न प्रत्यहं सेव्यते
शय्याप्रान्तविवर्तनैर्विगमयत्युन्निद्र एव क्षपाः ।
दाक्षिण्येन ददाति वाचमुचितामन्तःपुरेभ्यो यदा
गोत्रेषु स्खलितस्तदा भवति च व्रीडाविलक्षश्चिरम् ॥
रम्यं द्वेष्टि यथा पुरा प्रकृतिभिर्न प्रत्यहं सेव्यते
शय्याप्रान्तविवर्तनैर्विगमयत्युन्निद्र एव क्षपाः ।
दाक्षिण्येन ददाति वाचमुचितामन्तःपुरेभ्यो यदा
गोत्रेषु स्खलितस्तदा भवति च व्रीडाविलक्षश्चिरम् ॥
शय्याप्रान्तविवर्तनैर्विगमयत्युन्निद्र एव क्षपाः ।
दाक्षिण्येन ददाति वाचमुचितामन्तःपुरेभ्यो यदा
गोत्रेषु स्खलितस्तदा भवति च व्रीडाविलक्षश्चिरम् ॥
अन्वयः
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(सः) रम्यम् द्वेष्टि । यथा पुरा प्रकृतिभिः प्रत्यहम् न सेव्यते । उन्निद्रः एव शय्याप्रान्तविवर्तनैः क्षपाः विगमयति । यदा अन्तःपुरेभ्यः दाक्षिण्येन उचिताम् वाचम् ददाति, तदा गोत्रेषु स्खलितः (सन्) चिरम् व्रीडाविलक्षः च भवति ।
Summary
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He dislikes pleasant things and is not attended daily by his ministers as before. He passes sleepless nights, tossing on the edge of his bed. When, out of courtesy, he speaks to the ladies of his harem, he misspeaks their names and then remains embarrassed for a long time.
पदच्छेदः
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| रम्यम् | रम्य (२.१) | pleasant things |
| द्वेष्टि | द्वेष्टि (√द्विष् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | he hates |
| यथा | यथा | as |
| पुरा | पुरा | before |
| प्रकृतिभिः | प्रकृति (३.३) | by his ministers |
| न | न | not |
| प्रत्यहम् | प्रत्यहम् | daily |
| सेव्यते | सेव्यते (√सेव् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | he is attended |
| शय्याप्रान्तविवर्तनैः | शय्या–प्रान्त–विवर्तन (३.३) | with tossings on the edge of the bed |
| विगमयति | विगमयति (वि√गम् +णिच् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | he passes |
| उन्निद्रः | उन्निद्र (१.१) | sleepless |
| एव | एव | indeed |
| क्षपाः | क्षपा (२.३) | the nights |
| दाक्षिण्येन | दाक्षिण्य (३.१) | out of courtesy |
| ददाति | ददाति (√दा कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | he gives |
| वाचम् | वाच् (२.१) | speech |
| उचिताम् | उचित (२.१) | proper |
| अन्तःपुरेभ्यः | अन्तःपुर (४.३) | to the ladies of the harem |
| यदा | यदा | when |
| गोत्रेषु | गोत्र (७.३) | in names |
| स्खलितः | स्खलित (√स्खल्+क्त, १.१) | having slipped |
| तदा | तदा | then |
| भवति | भवति (√भू कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | he becomes |
| च | च | and |
| व्रीडाविलक्षः | व्रीडा–विलक्ष (१.१) | embarrassed with shame |
| चिरम् | चिरम् | for a long time |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| र | म्यं | द्वे | ष्टि | य | था | पु | रा | प्र | कृ | ति | भि | र्न | प्र | त्य | हं | से | व्य | ते |
| श | य्या | प्रा | न्त | वि | व | र्त | नै | र्वि | ग | म | य | त्यु | न्नि | द्र | ए | व | क्ष | पाः |
| दा | क्षि | ण्ये | न | द | दा | ति | वा | च | मु | चि | ता | म | न्तः | पु | रे | भ्यो | य | दा |
| गो | त्रे | षु | स्ख | लि | त | स्त | दा | भ | व | ति | च | व्री | डा | वि | ल | क्ष | श्चि | रम् |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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