अन्वयः
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तावत् केवला त्वत् मतिः प्रजाः परिपालयतु । इदम् अधिज्यम् धनुः अन्यस्मिन् कर्मणि व्यापृतम् अस्तु ।
Summary
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For now, let your intellect alone protect the subjects. This strung bow is engaged in another task.
पदच्छेदः
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| त्वन्मतिः | त्वद्–मति (१.१) | Your intellect |
| केवला | केवल (१.१) | alone |
| तावत् | तावत् | for now |
| परिपालयतु | परिपालयतु (परि√पाल् +णिच् कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | let it protect |
| प्रजाः | प्रजा (२.३) | the subjects |
| अधिज्यम् | अधिज्य (१.१) | strung |
| इदम् | इदम् (१.१) | this |
| अन्यस्मिन् | अन्य (७.१) | in another |
| कर्मणि | कर्मन् (७.१) | task |
| व्यापृतम् | व्यापृत (वि+आ√वृ+क्त, १.१) | is engaged |
| धनुः | धनुस् (१.१) | bow |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त्व | न्म | तिः | के | व | ला | ता | व |
| त्प | रि | पा | ल | य | तु | प्र | जाः |
| अ | धि | ज्य | मि | द | म | न्य | स्मि |
| न्क | र्म | णि | व्या | पृ | तं | द्ध | नुः |
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